संक्षेप: चुनाव आयोग के अनुसार जेडीयू 83 और भाजपा 80 सीटों पर आगे है। एनडीए की सहयोगी लोजपा-आर को 22 सीटों और HAM को 4 सीटों पर बढ़त मिल रही है। तेजस्वी यादव को इस नतीजे से बड़ा झटका लगा है।
बिहार विधानसभा चुनाव में वापसी की उम्मीद बांधकर शपथ की तारीख तक तय बताते फिर रहे तेजस्वी यादव को बड़ा झटका लगा है। शुरुआती रुझानों में आरजेडी सिर्फ 33 सीटों पर आगे है, जो 2020 की तुलना में आधे से भी कम है। तब आरजेडी 78 सीटों जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन इस बार हालात पूरी तरह बदल गए हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक जेडीयू 83 और भाजपा 80 सीटों पर आगे चल रही हैं। एनडीए की सहयोगी लोजपा-आर 22 सीटों पर और जीतनराम मांझी की HAM 4 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं।
एनडीए 200 सीटों के पार पहुंचता दिख रहा है, जबकि महागठबंधन कुल मिलाकर भी 50 सीटों तक नहीं पहुंच पा रहा है। अगर रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह आरजेडी के लिए 2010 जैसा ही चुनाव साबित हो सकता है, जब जेडीयू की लहर में आरजेडी सिर्फ 22 सीटों पर सिमट गई थी। इस दृष्टि से तेजस्वी यादव के राजनीतिक सफर को यह बड़ा धक्का माना जा रहा है। वहीं राहुल गांधी के लिए भी परिणाम निराशाजनक हैं—कैंपेन की कमान संभालने के बावजूद कांग्रेस को सिर्फ 5 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि उसने 62 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
लालू की चुनाव प्रचार से दूरी
बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव सिर्फ बैकएंड से सक्रिय दिखे, लेकिन चुनाव प्रचार से पूरी तरह दूर रहे। इस बार लालू फैक्टर दो दिशाओं में असर डालता नजर आया—और दोनों ही आरजेडी के लिए नुकसानदेह साबित हुए। एक तरफ उनके मैदान में न उतरने से समर्थक निराश हुए, वहीं विरोधियों ने लगातार ‘जंगलराज’ का मुद्दा उठाकर लालू फैक्टर को ही आरजेडी के खिलाफ इस्तेमाल किया, जिसका सीधा नुकसान पार्टी को झेलना पड़ा।
परिवार में कलह और विरोधियों की बढ़त
इस चुनाव में तेज प्रताप यादव अलग दल बनाकर मैदान में उतरे। न सिर्फ वे खुद हार गए, बल्कि कई सीटों पर आरजेडी को भी क्षति पहुंचाई। तेज प्रताप के इस रुख ने आरजेडी के चुनावी नैरेटिव को सबसे अधिक कमजोर किया। परिवार की यह कलह पार्टी के लिए उसी तरह नुकसानदेह साबित हुई, जैसा 2017 में यूपी में सपा को अपने भीतर के मतभेदों के कारण झटका लगा था।
नीतीश–मोदी की मजबूत जुगलबंदी
एनडीए ने शुरुआत से ही मजबूत समन्वय बनाए रखा। सीटों का साफ-सुथरा बंटवारा हुआ और सही समय पर प्रचार भी तेज कर दिया गया। नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के एक साथ मंच पर आने से वोटरों में भरोसा और स्थिरता का संदेश गया। इसके उलट महागठबंधन बिखरा हुआ नजर आया और उनके नेता भी प्रचार में एकजुट दिखाई नहीं दिए।
वादों की बजाय उपलब्धियों पर भरोसा
तेजस्वी यादव ने इस चुनाव में हर परिवार को एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया था और कई अन्य बड़े वादे भी किए थे। लेकिन इन वादों की तुलना में नीतीश कुमार की 10 हजार रुपये देने वाली योजना ज्यादा प्रभावशाली साबित हुई।
सीट वितरण को लेकर विवाद
महागठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे का विवाद अंत तक नहीं सुलझ पाया। करीब एक दर्जन सीटों पर केवल ‘फ्रेंडली फाइट’ की चर्चा हुई, लेकिन अंततः यही मतभेद भारी साबित हुए।
