संक्षेपः कानपुर के चर्चित अधिवक्ता अखिलेश दुबे से करीबी संबंध और अकूत संपत्ति के आरोपों से घिरे सीओ ऋषिकांत शुक्ला को निलंबित कर दिया गया है। उनके खिलाफ विजिलेंस जांच भी शुरू हो गई है। एसआईटी जांच में खुलासा हुआ है कि शुक्ला ने दस वर्षों में सौ करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति अर्जित की है।
कानपुर के चर्चित वकील अखिलेश दुबे के सहयोगी और उनके साथ मिलकर करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने वाले सीओ ऋषिकांत शुक्ला को निलंबित कर दिया गया है। उनकी अवैध कमाई की जांच का जिम्मा विजिलेंस को सौंपा गया है। करीब 15 वर्षों तक ऋषिकांत शुक्ला ने दरोगा से लेकर सीओ तक के पदों पर कानपुर में सेवा दी और वर्तमान में वह मैनपुरी जिले में सीओ भोगांव के पद पर तैनात थे। एसआईटी की जांच में खुलासा हुआ है कि उन्होंने अपने परिजनों, सहयोगियों और साझेदारों के साथ मिलकर लगभग 100 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाई है।
एसआईटी की जांच में खुलासा हुआ कि ऋषिकांत शुक्ला की करीब 12 संपत्तियों का बाज़ार मूल्य लगभग 92 करोड़ रुपये है। इसके अलावा, तीन और संपत्तियों की जानकारी मिली, लेकिन उनके दस्तावेज़ एसआईटी को नहीं मिल सके। जांच में यह भी सामने आया कि इन संपत्तियों की खरीद-फरोख्त में ऋषिकांत शुक्ला के पैन कार्ड का उपयोग किया गया। साथ ही, आर्यनगर क्षेत्र में उनकी 11 दुकानों का भी पता चला है।
एसआईटी की जांच में खुलासा हुआ है कि ये दुकानें ऋषिकांत शुक्ला ने अपने पड़ोसी देवेंद्र दुबे के नाम पर खरीदी हैं, जो उनकी बेनामी संपत्ति मानी जा रही हैं। जांच में सामने आया कि मिली हुई संपत्तियां उनकी आय के स्रोतों से कई गुना अधिक हैं। एसआईटी ने आशंका जताई है कि नौकरी से प्राप्त आय के आधार पर इतनी बड़ी संपत्ति अर्जित किया जाना संभव नहीं है।
जेल में बंद अधिवक्ता अखिलेश दुबे पर आरोप है कि उन्होंने झूठे पॉक्सो मामलों में लोगों को फंसाकर करोड़ों रुपये की रंगदारी वसूली। उनकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उनके सहयोगी पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच शुरू की थी। इस जांच में सीओ ऋषिकांत शुक्ला, संतोष कुमार सिंह, विकास पांडेय और इंस्पेक्टर आशीष द्विवेदी के नाम सामने आए। इनमें अखिलेश के एक करीबी इंस्पेक्टर को जेल भेजा जा चुका है, जबकि दूसरे पर बर्खास्तगी की कार्रवाई चल रही है। तीसरे आरोपी के रूप में सीओ ऋषिकांत शुक्ला का नाम सामने आया, जिनका निलंबन शासन ने सोमवार देर रात कर दिया और विजिलेंस जांच की अनुमति भी दे दी है।
पूर्व पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार के कार्यकाल में शुरू किए गए ऑपरेशन महाकाल से जुड़ी यह शासन की पहली बड़ी कार्रवाई है। इस अभियान का उद्देश्य अपराधियों और पुलिस के बीच गठजोड़ को तोड़ना था, जिसके लिए एसआईटी का गठन किया गया था। जांच में सामने आया कि सीओ ऋषिकांत शुक्ला ने कानपुर में तैनाती के दौरान अपार संपत्ति अर्जित की। एसआईटी ने पाया कि इतनी संपत्ति केवल सरकारी वेतन से अर्जित किया जाना संभव नहीं था।
एसआईटी ने अपनी जांच में यह आशंका जताई थी कि ऋषिकांत शुक्ला ने अखिलेश दुबे की संपत्तियों में भी निवेश किया है। इसके बाद कमिश्नरेट पुलिस ने इस मामले में शासन और डीजीपी को रिपोर्ट भेजी थी। इसी के आधार पर शासन ने अब विजिलेंस जांच की अनुमति प्रदान कर दी है। सूत्रों के अनुसार, जांच के दायरे में आए अन्य दागी पुलिसकर्मियों पर भी जल्द कार्रवाई की संभावना है।
एसआई से सीओ बनने तक कानपुर में तैनात रहे ऋषिकांत
एसआईटी की जांच में सीओ ऋषिकांत शुक्ला का कानपुर से गहरा जुड़ाव भी सामने आया है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बतौर सब-इंस्पेक्टर वर्ष 1998 से 2006 तक कानपुर में सेवा दी। इसके बाद दिसंबर 2006 से 2009 तक वे दोबारा कानपुर में ही तैनात रहे। इस तरह उन्होंने अपने पुलिस करियर के दस वर्षों से अधिक समय तक कानपुर में ही पदस्थापन पाया।
अखिलेश दुबे के पुलिस और केडीए गठजोड़ की भेजी गई थी रिपोर्ट
तत्कालीन पुलिस आयुक्त अखिल कुमार ने एसआईटी जांच के बाद विजिलेंस जांच की अनुशंसा करते हुए विस्तृत रिपोर्ट डीजीपी कार्यालय को भेजी थी। डीजीपी की मंजूरी के बाद शासन ने विजिलेंस जांच के आदेश जारी कर दिए।
रिपोर्ट में उल्लेख था कि अधिवक्ता अखिलेश दुबे ने अपना एक गिरोह बनाकर सुनियोजित तरीके से कार्य किया और अपने सहयोगियों के साथ मिलकर फर्जी मुकदमे दर्ज कराना, जबरन वसूली तथा जमीन कब्जाने जैसी गतिविधियों में शामिल रहा। जांच में यह भी सामने आया कि अखिलेश दुबे ने पुलिस, केडीए और अन्य विभागों से मजबूत गठजोड़ बनाकर अपने नेटवर्क को सक्रिय रखा।
संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून व्यवस्था) आशुतोष कुमार के अनुसार, एसआईटी जांच में ऋषिकांत शुक्ला द्वारा अकूत संपत्तियां अर्जित करने के साक्ष्य मिले थे। इसी आधार पर शासन को रिपोर्ट भेजी गई और शासन ने विजिलेंस जांच की अनुमति देते हुए यह कार्रवाई की।
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