श्रीमती भगवती जोशी
नई दिल्ली: अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे और दान के कथित गबन के आरोपों ने एक बार फिर देश में मंदिरों के प्रबंधन और वित्तीय पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के छह वर्ष बाद अब मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने ट्रस्ट के प्रशासन को अधिक पेशेवर बनाने के लिए एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त करने की वकालत की है। वहीं, विश्व हिंदू परिषद ने देशभर के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग दोहराई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि भारत के मंदिरों का प्रबंधन आखिर किन व्यवस्थाओं के तहत होता है और इसमें सरकार की भूमिका कितनी है।
भारत में मंदिरों की व्यवस्था: लाखों मंदिर, अलग-अलग मॉडल
अनुमानों के अनुसार भारत में करीब 10 लाख हिंदू मंदिर हैं। इनमें अधिकांश छोटे ग्रामीण मंदिर हैं, जिनका संचालन स्थानीय समुदाय, पुजारी परिवार या वंशानुगत पंडों द्वारा किया जाता है। दूसरी ओर बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों के पास विशाल संपत्तियां होती हैं और उन्हें हर वर्ष करोड़ों रुपये का दान प्राप्त होता है। ऐसे मंदिरों का संचालन आमतौर पर ट्रस्ट, मठ या धार्मिक संस्थाओं के माध्यम से किया जाता है।
मंदिर प्रबंधन के तीन प्रमुख पारंपरिक मॉडल
- पारिवारिक या पुजारी परंपरा
देश के अधिकांश मंदिरों का संचालन पीढ़ियों से एक ही पुजारी या पंडा परिवार करता आ रहा है। पूजा-पाठ, दान और मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी इन्हीं परिवारों के पास रहती है। जहां कई परिवार जुड़े होते हैं, वहां प्रबंधन बारी-बारी से संभाला जाता है।
उदाहरण: कर्नाटक का उडुपी श्रीकृष्ण मठ, जहां आठ मठ (अष्ट मठ) दो-दो वर्षों के लिए बारी-बारी से मंदिर का संचालन करते हैं।
- महंत प्रणाली
इस व्यवस्था में मंदिर का पूरा प्रशासन एक महंत, मठाधीश या पीठाधीश के हाथों में होता है। वही मंदिर की संपत्ति, दान और प्रशासन का प्रमुख होता है तथा अपना उत्तराधिकारी भी स्वयं तय करता है।
उदाहरण: उत्तर प्रदेश का गोरखनाथ मठ, जिसके वर्तमान पीठाधीश्वर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं।
- अखाड़ा या पंचायती प्रणाली
इस मॉडल में साधुओं के संगठित समूह यानी अखाड़े मंदिरों और धार्मिक संस्थानों का संचालन करते हैं। अखाड़े सामूहिक निर्णय के आधार पर पुजारियों की नियुक्ति, धार्मिक अनुष्ठानों और दान के प्रबंधन का कार्य संभालते हैं। महाकुंभ जैसे आयोजनों में इन अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
मंदिरों के प्रबंधन में सरकार की भूमिका
मंदिर प्रशासन में सरकारी हस्तक्षेप की शुरुआत ब्रिटिश काल में 1863 के धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम से हुई। बाद में 1925 के मद्रास हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम ने राज्य सरकारों को मंदिरों और धार्मिक संपत्तियों के नियमन का अधिकार दिया।
स्वतंत्रता के बाद कई राज्यों ने इसी आधार पर अपने-अपने कानून बनाए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25(2) राज्य को धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को विनियमित करने का अधिकार देता है। इसी संवैधानिक प्रावधान के आधार पर कई राज्यों में बड़े मंदिरों का प्रशासन सरकारी बोर्डों या विभागों की निगरानी में संचालित होता है।
इन राज्यों में सरकारें न केवल मंदिरों की आय और दान के लिए अलग खाते सुनिश्चित करती हैं, बल्कि कई स्थानों पर पुजारियों को वेतन भी देती हैं। बड़े मंदिरों की आय का एक हिस्सा छोटे मंदिरों के रखरखाव और अन्य जनकल्याणकारी कार्यों में भी लगाया जाता है।
बहस का केंद्र: पारदर्शिता बनाम सरकारी नियंत्रण
राम मंदिर दान विवाद के बाद दो प्रमुख मांगें सामने आई हैं। एक पक्ष मंदिरों में पेशेवर और पारदर्शी प्रशासन की वकालत कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सरकारी हस्तक्षेप समाप्त कर धार्मिक संस्थाओं को पूर्ण स्वायत्तता देने की मांग उठा रहा है।
आने वाले समय में यह बहस केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देशभर के बड़े मंदिरों के प्रशासन, दान की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी व्यापक चर्चा का विषय बन सकती है।
