- घनेन्द्र सिंह सरोहा
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता में आए 12 साल हो चुके हैं। 8-लेन की शानदार सड़कें, नए पुल, एयरपोर्ट का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि चमकाने में सरकार का कोई सानी नहीं दिखता। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक अजेय ‘चुनाव जीतने वाली मशीन’ में तब्दील हो चुकी है। लेकिन, इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवा मामले, भ्रष्टाचार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मोर्चे पर सरकार गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।
यहाँ हम पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रमों के आधार पर मोदी सरकार के सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियों और उनके राजनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण कर रहे हैं:
युवाओं की नाराजगी और शिक्षा प्रणाली पर उठते सवाल
पिछले 6 महीनों का रिकॉर्ड देखें तो युवाओं और छात्रों के मोर्चे पर सरकार को कई झटके लगे हैं:
- यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन विवाद: जनवरी में लाए गए इस ड्राफ्ट ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। एससी-एसटी छात्रों के साथ ओबीसी को शामिल करने से अगड़ी जातियों के छात्र नाराज दिखे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की अस्थाई रोक ने सरकार को बड़ी राहत दी।
- नीट (NEET) और सीबीएसई (CBSE) विवाद: नीट परीक्षा में लगभग 23 लाख और सीबीएसई 12वीं में 18 लाख छात्र बैठे। आंसर शीट और पेपर लीक जैसे मामलों ने ‘मोदी ब्रांड’ की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
- सीधा असर: इन परीक्षाओं की गड़बड़ी से सीधे तौर पर डेढ़ करोड़ परिवार (या वोटर) प्रभावित हुए हैं। सोशल मीडिया के युग में इसका नकारात्मक प्रभाव 10 से 20 करोड़ मध्यवर्गीय आबादी तक पहुँचता दिख रहा है।
चुनाव मशीनरी और ‘पब्लिक मेमोरी’ का गणित
इन सब के बावजूद, भाजपा का चुनावी तंत्र आत्मविश्वास से भरा है। पार्टी का मानना है कि चुनाव सिर्फ मीडिया की सुर्खियों से नहीं, बल्कि मजबूत ‘बूथ मैनेजमेंट’ और ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल से जीते जाते हैं।
- मास्टरस्ट्रोक अभी बाकी हैं: भाजपा के पास चुनाव जीतने के लिए कई रणनीतिक तीर मौजूद हैं। देश की करीब पौने तीन लाख पंचायतों और लोकसभा की 543 सीटों के परिसीमन का फॉर्मूला, महिला आरक्षण और ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे मुद्दे अभी भी पार्टी के तरकश में हैं।
- नैरेटिव सेट करने की कला: यह एक कड़वी सच्चाई है कि आम जनता की याददाश्त छोटी होती है। जनता के दिमाग में कौन सी खबर कब और कैसे फीड करनी है, इस कला में भाजपा को महारत हासिल है।
भ्रष्टाचार के आरोप और राम मंदिर दान विवाद
इलेक्टोरल बॉन्ड, राफेल डील, हिंडनबर्ग रिपोर्ट और दागी नेताओं को ‘वाशिंग मशीन’ में धोने जैसे तमाम आरोपों के बावजूद भाजपा ने लगातार चुनाव जीतकर इन मुद्दों को खारिज कर दिया। लेकिन हालिया घटनाक्रम पार्टी के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं:
- राम मंदिर दान चोरी के आरोप: राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के आरोपों ने भाजपा के हिंदुत्व कोर वोटर को आहत किया है।
- संघ और नेतृत्व की चिंता: इस मुद्दे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और स्वयं प्रधानमंत्री को भी चिंतित कर दिया है। विपक्ष को एक बड़ा राजनीतिक हथियार मिल गया है।
- यह एक पुरानी कहावत है कि जिस शक्ति (धर्म और राम मंदिर) के दम पर कोई संगठन ऊंचाई पर पहुँचता है, अगर उसकी सार-संभाल ठीक से न हो, तो वही शक्ति पतन का कारण भी बन सकती है।
विपक्ष की स्थिति और हिंदुत्व वोट बैंक की मजबूरी
सरकार की खामियों के बावजूद, बहुसंख्यक हिंदूवादी वोटर के पास विकल्पों का भारी अभाव है:
- कांग्रेस: कांग्रेस ने कभी श्रीराम को भगवान माना ही नहीं। कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से रामसेतु मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर श्रीराम को काल्पनिक चरित्र बताया था, जिसे हिंदू वोटर अभी भूले नहीं हैं।
- समाजवादी पार्टी (SP): मुस्लिम प्रेम मं डूबी और कार सेवकों पर गोली चलाने वाली समाजवादी पार्टी भले ही कुछ हद तक भाजपा को चुनावी डेंट दे दे, लेकिन वह बहुसंख्यक हिंदुओं का स्वाभाविक विकल्प नहीं बन सकती।
- विकल्पहीनता की इस स्थिति में नाराज हिंदू वोटर अंततः भाजपा की शरण में ही जाने को मजबूर दिखाई देता है।
डैमेज कंट्रोल: यूपी चुनाव से पहले भाजपा के लिए ‘सुझाव’
अगले साल फरवरी-मार्च में उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव होने हैं। डैमेज कंट्रोल के लिए राजनीतिक हलकों में निम्नलिखित कड़े कदमों की चर्चा है:
- कठोर कार्रवाई: राम मंदिर दान घोटाले के आरोपियों के घरों पर बुलडोजर की कार्रवाई हो।
- फास्ट ट्रैक न्याय: मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में डालकर रोजाना सुनवाई हो और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले।
- सनातन श्राइन बोर्ड का गठन: राम मंदिर दान प्रबंधन को पूरी तरह पारदर्शी और ‘लीक-प्रूफ’ बनाने के लिए एक ‘सनातन श्राइन बोर्ड’ बनाकर उसे सीधे केंद्र सरकार के अधीन किया जाए।
- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी: सबसे महत्वपूर्ण आखिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं जनता के सामने आकर नतमस्तक होकर स्वीकार करें और कहें हैं कि हां उनसे गलती हो गई है। तो कुछ हद तक जनता के दिलों पर मरहम लगाया जा सकता है।
निष्कर्ष: भ्रष्टाचार और धर्म का मिश्रण
सत्ता के गलियारों का इतिहास गवाह है कि सरकारें अक्सर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही जाती हैं।
- 1984 में 414 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत लाने वाली राजीव गांधी सरकार बोफोर्स घोटाले की भेंट चढ़ गई।
- 2014 में मनमोहन सिंह सरकार को 2जी, सीडब्ल्यूजी और कोयला घोटालों के कारण ही मोदी ने सत्ता से बेदखल किया था।
मोदी, संघ और भाजपा को यह गहराई से समझना होगा कि इस बार भ्रष्टाचार के आरोप केवल फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह ‘धर्म की चाशनी’ में लिपटा हुआ है और सीधे भगवान श्री राम के नाम से जुड़ा है। ठेस गहरी है, और इसका इलाज जल्द से जल्द करना राजनीतिक अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
