-घनेन्द्र सिंह सरोहा
नई दिल्ली, 4 अगस्त। पता नहीं मोदी और भाजपा को कुछ समझ आ रहा है या नहीं। दिखता तो नहीं है। 2012 में अन्ना आंदोलन के बाद से देश में राजनीति बदल गई है। सब कुछ बदल गया है। मोदी जी उसी घोड़े पर सवार होकर दिल्ली आए थे। तब यह घोड़ा अपने शेशव काल में था। यानि की जेन जी की भाषा में बोलूं तो चाइल्ड हुड टाइम पीरियड। जेन जी और जेन एल्फा आप लोग जब जन्म ले रहे थे तकरीबन उसी के आस-पास अपना देश एक नए दौर में एंट्री कर रहा था।
केजरीवाल भी इसी चिराग को घिसकर आया था और भाजपा और कांग्रेस के सामने ही दिल्ली विधानसभा की सत्ता हथिया ली थी। इस जिन्न का नाम था कम्यूनिकेशन। यानि संचार क्रांति। इस जिन्न का चिराग तब बड़े नेशनल मीडिया न्यूज चैनल वालों के पास था। तब यूट्यूब। फेसबुक तो थे। लेकिन लोग इतने एक्टिव नहीं थे। क्योंकि आम आदमी के पास कैमरे वाले फोन नहीं थे। की पेड वाले फोन थे।
2016 में जीओ के फ्री डाटा, फ्री कॉलिंग ने लोगों को हमेशा के लिए बदल दिया
देश, जेन जी के साथ तरुणाई ले रहा था। जेन मिलेनियल ने 2014 में इस कम्यूनिकेशन की लेंगुएज को समझ 10 साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस सरकार को दिल्ली से उखाड़ फैंका था। अब बारी जेन जी और जेन अल्फा की थी।
आम ज़िंदगी में जेन जी ने भी नर्सरी के बाद स्कूल जाना शुरू कर दिया था। और ठीक इसी दौरान आया था जीओ का… फ्री डाटा और फ्री कॉलिंग ऑफर। 2016 के इस ऑफर ने भारत को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।
लोग बदल गए। समाज बदल गया। राजनीति बदल गई। यह सब हो रहा था। धीरे-धीरे हो रहा था। लेकिन किसी को महसूस नहीं हो रहा था। क्योंकि हथेली में समा जाने वाली इस जादुई दुनिया में एंटरटेनमेंट और सूचना इतनी तेजी से आ रही थी कि किसी को रुककर, खड़े होकर सोचने का मौका ही नहीं मिल रहा था।
2020 में कोरोना लॉकडाउन में 15-15 सेकंड के टिकटॉक, पबजी में डूबा देश
फ्री डेटा की बहती गंगा में गोते लगाती तब की 120 करोड़ की जनता पर और मदहोशी छाई जब मार्च 2020 ने मोदी ने कोरोना के चलते पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन लगा दिया। जो कई फेज में करीब डेढ़ साल चला। लोग घरों में कैद हैं। क्या करते। मोबाइल की जद में पूरी तरह आ गए थे। यू-ट्यूब, फेसबुक, ट्विरटर के अलावा वे 15-15 सैकड्स का सुख देने वाले टिक-टॉक, शेयर चैट, पब जी जैसे नए एप्स में पूरी तरह डूब गए थे।
कोरोना हल्का होने के बाद जब दुनिया इससे बाहर निकली। तब तक लोगों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। उनकी सोच बदल चुकी थी। नेशनल मीडिया की जगह अब लोगों की हथेली मे मीडिया आ चुका था। वो जैसा भी था। सच्चा था। झूठा था। लोग इसमें खुश थे। और बहुत खुश थे। वर्क फ्रोम होम, स्कूल फ्रोम होम, टिक-टाक, शेयर चैट, पबजी, रॉब्लोक्स, लूडो, क्रिकेट में सट्टे के गेम्स । मोबाइल अब आम लोगों, खासतौर पर जैन जी के दिमाग में घुस चुका था।
देश दो नशे में मदहोश था
देश में दो नशे चल रहे थे। एक मोदी का। और दूसरा एक आम जनता का। मोदी का नशा था कि भारत को हर हाल में कांग्रेस मुक्त बनाना है। इसके लिए उन्होंने सरकारी योजनाओं की बाढ़ ला दी। बैंक अकाउंट खोलकर पैसे सीधे आम जनता के खाते में पहुंचा दिए। मकान, गैस सिलेंडर, टॉयलेट, किसानों को पैंशन, महिलाओं को लाडली योजना, मुद्रा योजना पता नहीं क्या, क्या। यहां मोदी की स्कीम बोलने लगूंगा तो पता नहीं कितने घंटे लग जाएँगे। 80 करोड़ जनता को घर बैठे राशन देना शुरू कर दिया। जो अब भी जारी है। सड़कों का, पुलों का, रेल पटरियों का जाल बिछा दिया। विश्व स्तर पर देश और अपनी छवि को चमका दिया।
मोदी जी ने राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, गरीब कल्याण सब किया लेकिन यहां चूक गए
इस सबके बीच मोदी ने देश वासियों को पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर चलाकर देशभक्ति से भर दिया। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटा पूर्ण रूप से देश में मिला लिया। हिन्दुत्व वोटरों को साधने के लिए राम मंदिर की स्थापना कर दी। यानि चुनाव जितने और देश के विकास के इंजन को तेजी से चलाने के लिए मोदी ने शतरंज की सारी गोटियां सही से बिछा दी थी।
लेकिन वे यहां चूक गए। इसका हिंट मोदी और भाजपा को अन्ना आंदोलन से मिल गया था। इसी कम्यूनिकेशन के भस्मासुर पर चढ़कर वे सत्ता में आए थे। लेकिन वे इसे ही भूल गए। बीते 12 साल में इस डिजिटल भस्मासुर ने 2019 में CAA, NRC का शाहीन बाग आंदोलन किया। उसके अगले साल 2020 में ट्रंप के समय दिल्ली में दंगों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। 2021 में किसान आंदोलन का साल भर चलना और लाल किले पर निशान ए साहिब का फहराना। इसके अगले साल 2022 राहुल की भारत यात्रा। 2022 और 2024 में यूपी में भाजपा का कमजोर होना और सपा का उदय होना।
विजय, धनुष नई पीढ़ी आ रही है मैदान में
और इन्हीं सबके बीच…सबसे महत्वपूर्ण दिल्ली में केजरीवाल, तमिलनाडु में अन्ना मलाई और अब टीवीके थलापति विजय जैसे युवाओं का इसी जादुई डिजिटल चिराग से भारत राजीनीति पटल पर उदय हुआ था। और अब लेटेस्ट तमिल फिल्मों के सुपरस्टार धनुष ने भी राजनीति में आने के संकेत दे दिए हैं। तय है आने वाले विधानसभा में मुकाबला विजय और धनुष में होगा। डीएमके और एआईडीएमके के लिए चिंता का विषय है। अन्ना मलाई क्या करेंगे। देखना होगा।
भाजपा ने नई पीढ़ी को मौका दिया…लेकिन
ऐसा नहीं है कि भाजपा ने इस बदलाव को समझ नहीं रही थी। लेकिन इतनी तेजी से नहीं जितनी तेजी से उसे समझना चाहिए था। उसने जैन मिलेनियम को मौका दिया। कांग्रेस में राहुल, सोनिया् से परेशान युवाओं की एक बड़ी टोली ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा, सुजय विखे पाटिल, आरपीएन सिंह, अनिल एंटनी, हार्दिक पटेल आदि को भाजपा में एंट्री दी गई। और अच्छी एंट्री दी गई। भाजाप ने खुद आसाम, बंगाल, महराष्ट्र, मध्य-प्रदेश, राजस्थान की कमान नई पीढ़ी को सौंपी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर 45 वर्षीय नितिन नबिन को कमान सौंपकर हिन्दुत्व और देशभक्ति के नशे में डूबे तकरीबन बेरोजगार मोबाइल धारी, युवाओं को संदेश दिया भी कि कमान अब युवाओं के हाथों में दी जा रही है।
भ्रष्टाचार की वाशिंग मशीन से धोबीघाट बनना… यहीं सब गड़बड़ा गया
इन सब हालात में जैन जी और जैन एल्फा को भूले बैठे मोदी और उनकी भाजपा…जी हां उनकी भाजपा को लग रहा था कि सब ठीक है। उन्हे अपने हिन्दुत्वाद, राष्ट्रवाद, सड़क, रेल, पुल निर्माण और सरकारी योजनाओं पूरा भरोसा था। इनके सहारे वे राज्य दर राज्य चुनाव जीतते भी जा रहे थे। इसी जीत ने नशे में उन्होंने धुरंधर भ्रष्टाचार के दागों को साफ करने वाली वाशिंग मशीन खोल डाली। बाद में शिवसेना, आम-आदमी पार्टी, तृणमूल को तोड़कर पूरा धोबी घाट ही खोल दिया।
जैन जी और जैन एल्फा को तो छोड़ों इससे बीजेपी के खुद के कट्टर समर्थकों में बहुत ही गलत मैसेज गया। वे भी मानने लगे कि भाजपा और कांग्रेस नेताओं में भेद खत्म हो गया। उन्हें भी सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे लगने लगे। हर हाल में जीत के लिए विचारधारा तक को ताक में रख दिया गया। इन्हीं सबके चलते समाज और राजनीति का पूरा चरित्र रसातल में चला गया। ब्यूरोक्रेसी में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया। आम जन के जीवन में यह मैसेज नीचे तक चला गया कि पैसे से कुछ भी खरीदा या कराया जा सकता है।
अपनी सफाई देने में सरकार सुस्त रही
इन्हीं सब विश्वास के टूटने और सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती बेरोजगारी के बीच रुपये का लगातार गिरना, 70 डॉलर प्रति बैरल के बावजूद पेट्रोल-डीजल के भाव नीचे नहीं आना और इथेनोल 20 पर सरकार की ओर से कोई जवाबदेही नहीं होना। यही सब जमीन के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी बनकर तैयार होने लगा। जो नीट पेपर लीक के नाम पर फूुट पड़ा।
मोदी और उनकी टीम इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। हर चुनाव को जीतने की मशीन तैयार करने के बाद मोदी और भाजपा दोनों निश्चिंत थे। लेकिन वे यहीं जैन जी और जैन एल्फा को भूुल गए। या यों कह लीजिए कि उनका इनपर ध्यान ही नहीं रहा। हाथ में मोबाइल और इंटरनेट लेकर पली-बढ़ी है।
जैन जी, एल्फा के लिए राम मंदिर, अनुच्छेद 370 फालतू की बातें
जैन जी, जैन एल्फा को पता ही नहीं है कि संघर्ष क्या होता है। उनके लिए कश्मीर का अनुच्छेद 370 और राम मंदिर बेमानी, बेफालतू की बात है। उनका साफ कहना है कि मोदी ने हमारे लिए किया ही क्या है। और आज हालात यह है कि ये जेनरेशन…..किसी के सामने झुकना तो छोड़िए…किसी की कुछ भी नहीं सुनने वाली सरकार के सामने सीना तानकर खड़ी हो गई। सरकार भौचक्क। यह कैसे हुआ। इसके बारे में तो सोचा ही नहीं था। सत्ता में बने रहने की उसने हर तैयारी कर रखी थी लेकिन इस मुसीबत का क्या। जो मुंह बाए सामने खड़ी थी।
सीजेपी आंदोलन ने मोदी और बीजेपी का सारा भूत 5 दिन सिर्फ 5 दिन में उतार दिया। मोदी को सीधे हकीकत की जमीन पर ला खड़ा किया। इसी के चलते उन्हें रात 12 बजे चार-चार सेल्फी वीडियो बनाने पड़े।
बीजेपी सबकुछ मोदी के कंधे पर डाल देती है और मोदी भी अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं
मोदी और भाजपा को अब क्या करना चाहिए। यह मैं पहले के वीडियो में बता चुका हूं। इसपर उन्होंने काम शुरू भी कर दिया है। लेकिन मुझे लगता है कि यह कुछ ऐसे ही होगा जैसे पेट्रोल के दाम बढ़ने पर प्रधानमंत्री का काफिला 3 गाड़ियों तक सिमट गया था। देखा-देखी नीचे तक सभी नेता इलेक्ट्रिक कार, शेयरिंग कार या कुछ तो बेट्री रिक्क्षा तक में आने लगे। लेकिन यह सिर्फ दो दिन चला और फिर वही ढाक के तीन पात। समस्या क्या है। पता है। हर बात का ठेका प्रधानमंत्री खुद अपने ऊपर ले लेते हैं। वही सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली बन जाते हैं। बाकि पूरी टीम हाथ पर हाथ धरके बैठ जाती है। कि मोदी जी ने जिम्मेदारी संभाल ली है। वे कर लेंगे। स्वस्छता अभियान मेंं भी यही होने लगा। कचरा फैलाकर झाड़ू लगाकर फोटो खींचवाना। लेकिन अब यह नहीं चलेगा। आंख में धूल झोंकने वाला काम। क्योंकि सबके हाथ में कैमरा है। जो सच दिखा ही देता है। खैर भाजपा इस काम को करेगी या नही। यह तो मुझे नहीं पता। लेकिन मेरा काम है बताना। करना या नहीं करना उनकी इच्छा।
पहला सझाव- पूरी भाजपा को सेल्फी मोड में आना होगा
पहला, तो यह है कि भाजपा के बड़े से बड़े नेता से लेकर 13 करोड़ सदस्यों तक हरेक को सेल्फी वी़डियो पर आना होगा। और हमेशा बने रहना होगा। यह होने तो लगा है लेकिन दिखावा ज्यादा दिख रहा है। और ठीक इसी बीच अच्छी सेल्फी बना रहे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजान पूनावाला ने पार्टी को छोड़ दिया।
दूसरा सुझाव- सरपंच लेकर सांसद तक जेन जी, एल्फा को भी मिले टिकट
दूसरा, सरपंच, प्रधान से लेकर नगर पालिका, जिला परिषद, विधायक, सांसद तक के लिए जैन जी, जैन एल्फा के चेहरों को सामने लाकर चुनाव जिताए।
तीसरा सुझाव- मेटा, गूगल सर्च जैसी कंपनियां स्वदेश में भी बने, तब तक उन पर नकेल लगे
तीसरा, विदेशी कंपनियों मेटा की इंस्टाग्राम, फेसबुक, वाट्स अप, एक्स और गूगल, यूट्यूब की जगह भारत को अपने डिजिटल प्लेटफार्म और सर्च इंजन तैयार करने होंगे। जब तक नहीं होते तब तक विदेशी कंपनियों पर पूरी नकेल कसनी होगी। नहीं तो इन शक्तियों ने 2012 से अब तक क्या किया है वह आपके सामने है और आगे क्या करेंगी। यह भी आपको पता है। इसके बावजूद आप नहीं चेतोगे तो फिर देश में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे हालात बनने से कोई नहीं रोक सकता।
चौथा सुझाव- धरना स्थल जंतर-मंतर से हटाया जाए
चौथा मैंने बताया था कि जंतर-मंतर की जगह धरना स्थल, राम लीला मैदान या छत्रसाल स्टेडियम या बुराड़ी का खुला मैदान रखें। इसपर सुप्रीम कोर्ट में रिट भी लग गई है। अच्छा किया। क्योंकि जंतर-मंतर नई संसद, राष्ट्रपति भवन और सभी महत्वपूर्ण मंत्रालयों के ठीक बीच में है। एक किलोमीटर के अंदर-अंदर तकरीबन सभी इसकी जद में हैं। दूरी रहेगी तो ठीक रहेगा।
पांचवा सुझाव- ब्यूरोक्रेसी को अकाउंटेबल बनाया जाए
पांचवा, ब्यूरोक्रेसी को अकाउंटेबल बनाने का समय आ गया है। क्योंकि इसी की गैरजिम्मेदारी की वजह से आप लोग सत्ता से जाओगे। इसलिए इनको प्रोफेशनल बनाओ नहीं तो नौकरी से तुरंत बाहर फैंको।
छठा और सबसे महत्वपूर्ण जमीन पर और ऑनलाइन सब जगह जैन जी, जैन एल्फा और आने वाले कुछ सालों में जैन बीटा की आवाज को अपने बीच जगह दो। उनकी बातों को गंभीरता से लें। और साथ में मोदी सरकार इस नई जेनरेशन के लिए जैन जी, एल्फा, बीटा मंत्रालय खोल दे।
आने वाला भारत सिर्फ पुरानी पीढ़ियों की सोच से नहीं चलेगा। भारत को नई पीढ़ी के साथ मिलकर चलना होगा। मोदी जी ने देश को बदलने के लिए बहुत काम किया है। लेकिन अब समय देश की नई पीढ़ी को समझने का है। सड़कें बनाना जरूरी है। पुल बनाना जरूरी है। रेलवे का विस्तार जरूरी है। मंदिर बनाना जरूरी है। राष्ट्रवाद जरूरी है। सरकारी योजनाएं जरूरी हैं। लेकिन इसके साथ-साथ—नई पीढ़ी की उम्मीदें समझना भी जरूरी है। उनके सवालों का जवाब देना भी जरूरी है। और सबसे जरूरी—सरकार की हर व्यवस्था को जवाबदेह बनाना जरूरी है। क्योंकि आज हर हाथ में मोबाइल है। हर मोबाइल में कैमरा है। और अब कैमरा सिर्फ फोटो नहीं खींचता। वह सरकार से सवाल भी पूछता है। वह व्यवस्था की कमियां भी दिखाता है। वह भ्रष्टाचार को भी सामने लाता है। और वह नई राजनीति भी पैदा कर सकता है। इसलिए मोदी जी…
अब समय आ गया है—
ब्यूरोक्रेसी के लोहे के किले को जवाबदेह बनाने का। और—जेन-जी, जेन-अल्फा और आने वाली जेन-बीटा की आवाज को सरकार के केंद्र में जगह देने का। क्योंकि जो सरकार नई पीढ़ी को समझ लेगी—वही भविष्य की राजनीति को समझ पाएगी। और जो नई पीढ़ी की आवाज को नजरअंदाज करेगी—उसका बंटाधार होना तय है
आपको क्या लगता है?
क्या भारत में जेन-जी, जेन-अल्फा और आने वाली जेन-बीटा के लिए अलग मंत्रालय या राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए? क्या ब्यूरोक्रेसी को सीधे जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाया जाना चाहिए? और क्या राजनीतिक दलों को नई पीढ़ी को सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाला भागीदार मानना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखिए। वीडियो अच्छा लगा हो तो लाइक कीजिए। चैनल को सब्सक्राइब कीजिए। और इस वीडियो को उन लोगों तक जरूर पहुंचाइए, जिन्हें लगता है कि भारत बदल रहा है—लेकिन राजनीति अभी भी पुराने तरीके से चल रही है। नमस्कार। जय हिंद। जय भारत।
