भगवती जोशी
फतहनगर. देश के किसी भी राज्य में आंगनबाड़ी का उद्देश्य होता है कि वहां पर नन्हे मुन्नो का शारीरिक और मानसिक सर्वांगीण विकास हो सके. राजस्थान सरकार इसके लिए हर साल हजारों करोड रुपए खर्च भी करती है लेकिन फतह नगर सनवाड नगर पालिका कार्यालय से मात्र 1 किलोमीटर दूर कस्बे में चल रही आंगनवाड़ी को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यहां पर देश के नौनिहालों को विकसित भारत के लिए तैयार किया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार आंगनवाड़ी में बच्चों को खिचड़ी, दूध आदि देने का तो प्रयास कर रही है लेकिन जहां बैठने की ही व्यवस्था न हो, खेलने कूदने की भी जगह ना हो. शौच के लिए बच्चों को आंगनबाड़ी से बाहर जाना पड़ता हो ऐसे स्थिति को क्या ही कहा जाए.
यह स्थिति है फतहनगर सनवाड नगर पालिका के वार्ड नंबर 3 में किराए के खंडहर नुमा आंगनबाड़ी केंद्र की. आंगनवाड़ी में घुसते ही बच्चों की रपट पट्टी पड़ी है जिस पर चढ़ने और उतरने की जगह तो छोड़िए उसके पास खड़े होने की भी जगह नहीं है. शौच के लिए दिखावे के लिए शौचालय तो है लेकिन देखने पर पता चलता है कि बनने के बाद इसका कभी ही उपयोग किया गया होगा. बायी ओर लकड़ी और पत्थरों का ढेर पड़ा हुआ है जिसमें से बारिश के समय कभी भी सांप और बिच्छू बच्चों की ओर दौड़ पड़ते हैं.
दीवारों का प्लास्टर उखड़ गया है और छत पर तो पत्थर की सिलियाँ देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस पर कभी चिनाई हुई ही नहीं. तपती गर्मी में बच्चों के लिए एक पंखा भी उपलब्ध नहीं है.
तकरीबन खुले में बैठे बच्चों का सर्दियों और बारिश में क्या हाल होता होगा देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है. आंगनबाड़ी के इन हालात को देखकर ही परिजन अपने बच्चों को यहां भेजने से कतराते हैं.
क्या कहना है मां का
क्या कहना है मां का
बच्चों को लेने आई महिला का कहना था कि खाना पीना तो ठीक है. लेकिन इस खंडहर में अपने बच्चों को भेजने का उनका भी मन घबराता है. छत पर पंखा नहीं है. दिवार टूटी हुई है. इस कबाड़ और पत्थरों से सांप छछूंदर कभी भी निकलते रहते हैं.सरकार ध्यान ही नहीं देती.
क्या कहना है आंगनबाड़ी सहायिका का
अधिकारियों को कई बार नए भवन के लिए कहा जा चुका है. बड़ी मुश्किल से मैं वार्ड के बच्चों को केंद्र तक ला पाती हूं. अभी 10 बच्चे यहां आ रहे हैं.
