Wednesday, May 13, 2026
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श्रीलंका और बांग्लादेश में सत्ता बदलवा चुका है Gen-Z, क्या नेपाल की सरकार भी संकट में है?

नेपाल प्रदर्शन की अंदरूनी कहानी: जेन-ज़ेड की भूमिका और वर्तमान संकट

नेपाल में अतीत में कई बार युवाओं ने विद्रोहों में अहम भूमिका निभाई है। वर्तमान में हो रहे विरोध प्रदर्शन उन आंदोलनों की तरह हैं जिन्हें श्रीलंका (2022) और बांग्लादेश (2024) में भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं ने नेतृत्व देकर शुरू किया था। इन देशों में जेन-ज़ेड ने नेतृत्व संभाला था और अब नेपाल में भी प्रदर्शनकारियों ने सरकारी कार्यालयों में तोड़फोड़ की, भ्रष्टाचार की जांच और बंद इंटरनेट मीडिया को बहाल करने की मांग उठाई है।

हाईलाइट्स

  • श्रीलंका (2022) और बांग्लादेश (2024) की तरह नेपाल में भी आंदोलन।
  • तीनों देशों में जेन-ज़ेड ने आंदोलन की कमान संभाली।
  • जेनरेशन-ज़ेड यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई वह पीढ़ी जो इंटरनेट और आधुनिक तकनीक के साथ बड़ी हुई।

श्रीलंका और बांग्लादेश की कहानी: युवाओं ने कैसे बदला सत्ता का समीकरण

इन दोनों देशों में युवाओं ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और राजनीतिक अन्याय के खिलाफ आंदोलन चलाया। शुरू में ये आंदोलन राजनीतिक नहीं थे, लेकिन धीरे-धीरे ये सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बदल गए।

श्रीलंका – ईंधन और खाद्य संकट ने बढ़ाई नाराज़गी

श्रीलंका में बढ़ती ईंधन और खाद्य पदार्थों की कमी ने युवाओं को विरोध प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन बाद में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालयों पर कब्जे का रूप ले लिया। इसके चलते राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को इस्तीफा देना पड़ा। आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया और रिपोर्टों में कहा गया कि कुछ राजनीतिक ताकतों ने इसे अपने हित में भटका दिया। 2024 में नई सरकार बनने के बाद नीति और प्रशासन में बड़े बदलाव किए गए।

बांग्लादेश – आरक्षण नीति के खिलाफ छात्रों का आंदोलन

बांग्लादेश में छात्रों ने सरकारी नौकरियों में कोटा नीति का विरोध किया। उनका कहना था कि राजनीतिक निष्ठावानों को लाभ मिलता है, जबकि योग्य उम्मीदवार वंचित रह जाते हैं। प्रदर्शन बढ़ते गए और सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया। अंततः प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास घेर लिया, जिससे 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना देश छोड़कर भाग गईं और उनकी 16 वर्षों की सत्ता का अंत हो गया। इसके बाद छात्र नेताओं ने “नेशनल सिटीजन पार्टी” बनाई और नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मोहम्मद यूनुस की देखरेख वाली अंतरिम सरकार में शामिल हो गए।

नेपाल में उग्र होते आंदोलन

नेपाल में भी श्रीलंका और बांग्लादेश की तरह डिजिटल रूप से दक्ष युवाओं ने पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से बाहर निकलकर आंदोलन चलाया। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और एन्क्रिप्टेड चैट ऐप्स का इस्तेमाल कर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू किए गए। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ा, अराजक तत्व शामिल हो गए और हिंसा तथा तोड़फोड़ की घटनाएँ बढ़ गईं।

आंदोलन में शामिल अराजक तत्व

नेपाल के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने कहा कि देशव्यापी जेन-ज़ेड आंदोलन में अराजक और प्रतिक्रियावादी तत्व घुस गए थे। आंदोलन की मुख्य मांगें भ्रष्टाचार की जांच और इंटरनेट मीडिया की बहाली थी, लेकिन सरकारी कार्यालयों को नुकसान पहुँचाया गया जिससे कई दुखद घटनाएँ हुईं।

आंदोलन के नेताओं ने भी स्वीकार किया कि बाहरी तत्वों ने हिंसा को भड़काया। उन्होंने सरकारी इमारतों पर हमला किया और संसद भवन में जबरन घुसने की कोशिश की।

पूर्व डीआईजी हेमंत मल्ला ने कहा, “सरकार की खुफिया एजेंसी ने स्थिति का सही आकलन नहीं किया। अगर उन्होंने आंदोलन की गंभीरता समझी होती और तैयारी की होती तो जानमाल का नुकसान रोका जा सकता था।

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