आज़ादी के बाद पहली बार होने जा रही जातिवार जनगणना के आंकड़ों के आने के बाद देश में ओबीसी सूची में बड़ा फेरबदल संभव है। जनसंख्या, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के आधार पर कई जातियों को ओबीसी सूची से बाहर किया जा सकता है, वहीं कई नई जातियाँ जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हैं, उन्हें इस सूची में शामिल किया जा सकता है।
सरकार का उद्देश्य जातिगत आधार पर चल रही राजनीति को नियंत्रित करना और ओबीसी वर्ग की सूची को तथ्यों के आधार पर पुनः संरचित करना है। बताया जा रहा है कि इस दिशा में अंतिम मुहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की बातचीत के बाद लगी। इस अहम बैठक में केंद्रीय गृह व सहकारिता मंत्री अमित शाह भी मौजूद थे।
जातिवार गणना पर विराम लगाने की योजना
जातिवार गणना को लेकर सरकार ने एक दीर्घकालिक रणनीति तैयार की है। उच्च स्तरीय सूत्रों का कहना है कि दशकों से जातियों की गोलबंदी का आधार बनी जातिवार जनगणना की राजनीति को खत्म करने के लिए यह ठोस निर्णय लिया गया है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में पलक्कड में हुई आरएसएस की समन्वय बैठक में यह स्पष्ट किया गया था कि संघ जातिवार गणना के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह इसके राजनीतिक दुरुपयोग का विरोध करता है। इसी कारण इसे आधिकारिक जनगणना प्रक्रिया से जोड़ा गया है, ताकि सभी धर्मों और समुदायों की जातियों के आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर का वास्तविक आंकलन किया जा सके।
जातिवार गणना को संस्थागत रूप देने की तैयारी
सूत्रों के अनुसार हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया कि आगामी जनगणना के साथ-साथ जातिवार गणना भी कराई जाएगी। इतना ही नहीं, सरकार इस प्रक्रिया को स्थायी स्वरूप देने पर भी विचार कर रही है। यानी भविष्य में हर दशक में होने वाली जनगणना के साथ जातिगत आंकड़ों का संग्रह भी एक नियमित प्रक्रिया बन सकता है। इससे हर दस वर्षों में देश की सभी जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करना संभव होगा, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-सी जातियाँ पिछड़ेपन की श्रेणी में बनी हुई हैं और कौन-सी जातियाँ अब अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में पहुँच चुकी हैं।
ओबीसी सूची में संशोधन की ठोस नींव
इस प्रक्रिया से ओबीसी सूची को अद्यतन करने का एक मजबूत और तथ्यात्मक आधार मिल सकता है। सामाजिक रूप से पिछड़ी नई जातियाँ सूची में जोड़ी जा सकती हैं, जबकि वे जातियाँ जो अब इन मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें सूची से हटाने की संभावना होगी। हालांकि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उस समय की सरकार राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए क्या निर्णय लेती है। साथ ही यदि विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध हों, तो ओबीसी सूची में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना भी संभव होगा—जो अभी ठोस डेटा के अभाव में मुश्किल है।
आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था 1931 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है
इस समय देश में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को लेकर जो एकमात्र आधिकारिक आंकड़ा मौजूद है, वह 1931 की जनगणना का है। इसी जनगणना के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि देश की लगभग 52 प्रतिशत आबादी पिछड़ी जातियों की है, और इसी आंकड़े को आधार बनाकर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू किया गया। हालांकि, 1941 की जनगणना के दौरान द्वितीय विश्व युद्ध के कारण अंग्रेजों ने लागत और संसाधनों की कमी का हवाला देकर जातिवार आंकड़े नहीं जुटाए। इसके बाद आज़ादी के पश्चात 1951 से लेकर अब तक विभिन्न सरकारों ने जातिवार जनगणना को प्राथमिकता नहीं दी, और यह मुद्दा लगातार अनदेखा होता रहा।
सर्वे आधारित आरक्षण में भरोसे की कमी
1991 में मंडल आयोग की सिफारिशों पर ओबीसी आरक्षण लागू किया गया, लेकिन इसका आधार वही पुराना 1931 का आंकड़ा था, जिस पर कई विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए। समय-समय पर राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर सर्वेक्षण कर ओबीसी जातियों की पहचान की, लेकिन इन सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर विवाद होते रहे। 2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक, आर्थिक और जातीय सर्वेक्षण (SECC) कराया जरूर, लेकिन इसे आधिकारिक जनगणना का हिस्सा न बनाकर एक अलग सर्वेक्षण के रूप में किया गया। भारी गड़बड़ियों और डेटा की गुणवत्ता पर उठे सवालों के चलते न केवल तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार, बल्कि बाद में नरेंद्र मोदी सरकार ने भी इसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं करने का फैसला किया।
