- याचिकाकर्ता ने कहा—राजनीतिक समझौते के आधार पर दंगा और हिंसा के मामले वापस लेना भविष्य के आंदोलनों के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है.
नई दिल्ली, 5 अगस्त। छात्र प्रदर्शनों के दौरान दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लेने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को तीखी बहस हुई। एक याचिकाकर्ता ने केंद्र और राज्य सरकारों को राजनीतिक समझौते के आधार पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज दंगा और हिंसा के मामले वापस लेने से रोकने की मांग करते हुए कहा कि इससे भविष्य में नए आंदोलनों को बढ़ावा मिल सकता है।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया, “आज जेन जेड है, कल जेन अल्फा, जेन बीटा और जेन डेल्टा आएंगे।” दलील दी गई कि यदि हिंसा या कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में राजनीतिक दबाव अथवा समझौते के आधार पर कार्रवाई वापस ली गई तो यह भविष्य के लिए एक खतरनाक उदाहरण बन सकता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मामलों के साथ जोड़ दिया। इससे पहले 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस ली जा सकती हैं।
15 दिन बीत चुके हैं। आयोजकों की जवाबदेही का क्या हुआ?
मनीष कुमार सोलंकी की ओर से दायर याचिका में छात्र प्रदर्शनों के आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता रिजवान अहमद ने कहा कि प्रदर्शन मंत्री और पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा हो सकता है, लेकिन प्रदर्शन के आयोजकों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “15 दिन बीत चुके हैं। आयोजकों की जवाबदेही का क्या हुआ? वे अलग-अलग चैनलों पर जाकर भड़काऊ बयान दे रहे हैं और स्थिति को शांत करने के बजाय आग को और भड़का रहे हैं।”
अहमद ने कहा कि संबंधित संगठन कोई पंजीकृत संगठन नहीं है और प्रदर्शन के दौरान यदि कोई अप्रिय घटना होती है तो कानून के तहत आयोजकों की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
‘सरकार के झुकने से गलत मिसाल बनेगी’
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अहमद ने कहा कि केंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों की मांग मानते हुए उनके खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने के लिए तैयार है, लेकिन इससे भविष्य में दूसरे समूह भी इसी तरह दबाव बनाने का प्रयास कर सकते हैं।
उन्होंने राजस्थान में हाल में हुई कानून-व्यवस्था की एक घटना का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि यदि राष्ट्रीय राजधानी से जुड़े मामले में सरकार प्रदर्शनकारियों की मांगों के आगे झुकती है तो क्या दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की मांगों के सामने सरकार को झुकना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि केवल इस आधार पर हिंसा में शामिल लोगों को छोड़ा नहीं जा सकता कि सरकार किसी मुद्दे पर गलत स्थिति में फंस गई है।
‘पत्थरबाजों को बिना कार्रवाई के नहीं छोड़ा जा सकता’
अधिवक्ता अहमद ने स्पष्ट किया कि वह प्रदर्शन में शामिल नाबालिगों के लिए कठोर आपराधिक सजा की मांग नहीं कर रहे हैं। उन्होंने अपमानजनक या अभद्र नारे लगाने वाले नाबालिगों से निगरानी में सामुदायिक सेवा कराने का सुझाव दिया।
हालांकि उन्होंने कहा कि हिंसा या पत्थरबाजी में शामिल लोगों को केवल राजनीतिक समझौते के आधार पर बिना कार्रवाई के नहीं छोड़ा जा सकता।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि ऐसे मामलों को माफ किया गया तो भविष्य में अलग-अलग समूह संसद की ओर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर सकते हैं। उन्होंने किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि बड़ी संख्या में लोग संसद परिसर में प्रवेश कर जाएं तो सुरक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो सकती है।
सीजेआई बोले—युवाओं को समझाने और उनकी बात सुनने की जरूरत
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि शक्तिशाली राज्य की ओर से दिखाई गई आक्रामकता स्थिति को और गंभीर बना सकती है। उन्होंने कहा कि संभवतः इसी सोच के तहत प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले वापस लेने पर विचार किया गया होगा।
सीजेआई ने कहा, “ये युवा हैं। इन्हें मार्गदर्शन और परामर्श की जरूरत है। ताकतवर राज्य की ओर से होने वाली आक्रामक कार्रवाई स्थिति को अनावश्यक रूप से और बिगाड़ सकती है तथा आगे हिंसा को जन्म दे सकती है। इससे बचने की जरूरत है।”
उन्होंने कहा कि पुलिस को भी अत्यधिक संयम बरतना चाहिए, ताकि किसी घटना के बाद स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमें बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा, ताकि युवा हिंसा का रास्ता न अपनाएं। बेहतर तरीका यह है कि उन्हें समझाया जाए, शांत किया जाए और भरोसा दिलाया जाए कि उनकी बात सुनी जा रही है। लोगों की बात सुनना सबसे प्रभावी माध्यम है।”
अभद्र भाषा इस्तेमाल करने वालों की पहचान की मांग
जनहित याचिका में जुलाई 2026 के दौरान हुए छात्र प्रदर्शनों और मार्च के दौरान पुलिस तथा सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक, अभद्र या मानहानिकारक भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोगों की पहचान करने की मांग की गई है।
याचिका में केंद्र सरकार और अन्य संबंधित अधिकारियों को वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरों और अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ऐसे लोगों की पहचान करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसमें नाबालिग और वयस्क, दोनों शामिल होंगे।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि दोषी पाए जाने वाले लोगों से निगरानी में सामुदायिक सेवा कराई जाए। इसमें धार्मिक स्थलों या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सफाई और स्वच्छता कार्य शामिल हो सकते हैं। हालांकि यह कार्रवाई कानून के तहत चलने वाली किसी भी आपराधिक प्रक्रिया से अलग होगी।
राजनीतिक समझौते के आधार पर केस वापस लेने पर रोक की मांग
याचिका में यह भी मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट करे कि केंद्र या राज्य सरकारें केवल राजनीतिक समझौते अथवा सहमति के आधार पर दंगा और हिंसा से जुड़े मामलों में सामूहिक माफी नहीं दे सकतीं और न ही अभियोजन वापस ले सकती हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले को वापस लेने का फैसला कानून और संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही होना चाहिए।
याचिका के अंतिम निस्तारण तक केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जून-जुलाई 2026 के छात्र प्रदर्शनों अथवा इसी तरह की हिंसक घटनाओं से जुड़े मामलों को केवल राजनीतिक समझौते के आधार पर वापस लेने से रोकने की अंतरिम मांग भी की गई है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को छात्र प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मामलों के साथ जोड़ दिया है। मामले पर आगे की सुनवाई अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ की जाएगी।
