घनेन्द्र सिंह सरोहा
नई दिल्ली, 27 सितंबर। मैं कई दिनों से कन्फ्यूज था। क्या लिखूं। क्योंकि मुझे इंडियन एक्स्प्रैस अखबार पर तो भरोसा नहीं था। क्योंकि इसका एक नमूना मैं 4 अप्रैल 2012 को देख चुका हू्ं… जब उसने खबर छापी थी कि सेना की दो टुकड़ी हिसार और आगरा से 16 जनवरी 2012 को दिल्ली को ओर कूच कर रही है। वह भी सरकार को बिना बताए हुए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह तख्ता पलट की कोशिश थी। कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार और सेना ने इसे बैसिरपैर की खबर बता सिरे से खारिज कर दिया था।
विपक्ष की रणनीति और आरोपों की लंबी सूची
अब फिर इंडियन एक्स्प्रैस ऐसी ही उट-पटांग खबर लेकर आया है। विपक्ष को तो ऐसी खबरों का वैसे ही इंतजार रहता है। राहुल समेत पूरा विपक्ष वैसे ही परेशान है कि बीजेपी को वे चुनाव में तो नहीं हरा पा रहे तो कैसे उनके खिलाफ हवा बनाकर उन्हें उखाड़ फैंके। अडानी-अंबानी के आरोप, राफेल घोटाला, पेगासस जासूसी, सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल, CAA, NRC …लाइन लंबी है। कोई मौका नहीं जो विपक्ष खासतौर पर राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर हमला करने से नहीं चूका हो।
नए मुद्दों के साथ मैदान में उतरा विपक्ष
और अब यूजीसी विवाद, राम मंदिर चोरी, नीट पेपर चोरी पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद अमित शाह के इस्तीफे की मांग, भाजपा से मनुस्मृति को चिपकाना और इसी फेरहिस्त में इंडियन एक्स्प्रैस की चुनाव आयोग पर यह खबर। खबर छपी नहीं कि भाई लोग सब कूद पड़े मैदान में।
मोदी सरकार से हिसाब चुकता करने की लामबंदी
सबको लगने लगा कि यही मौका है मोदी सरकार को दबोचने का। बड़ी मुश्किल से हाथ में आई है। राहुल तो राहुल….ममता ने धुर विरोधी वामपंथियों से हाथ मिला लिया। क्योंकि सबको मोदी की भाजपा से हिसाब चुकता करना है। शिव सेना, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सब अपनी टूट का जिम्मेदार मोदी सरकार को मानते है। इसलिए वे कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते हैं।
दिल्ली बैठक और मुंबई में विरोध प्रदर्शनों की योजना
इसीलिए उन्होंने 30 सितंबर को दिल्ली में बैठक बुलाई है कि कैसे मोदी सरकार को कथित वोट चोरी के मामले में घेरा जाए। धनियों यानि तिलचट्टों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की ठानी है। कहा कि वे 2 अक्टूबर को मुंबई में जंतर-मंतर पार्ट 2 करेंगे। अब देवेन्द्र फडनवीस के ऊपर है कि वे क्या करते हैं। इसी तरह बाल ठाकरे की विरासत सम्भालने का दावा करने वाले दो चचेर भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने भी 4 अक्टूबर को मुंबई में मार्च निकालने की घोषणा की है।
देशव्यापी प्रदर्शन और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग
कांग्रेस भी 28 सितंबर को सभी जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने जा रही है। सबका एजेंडा एक ही है। सरकार के माथे पर वोट चोरी का चिट्ठा चिपका दिया जाए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग कर। सुप्रीम कोर्ट में PIL भी लगा दी गई है।
यूट्यूब लाइव की सीमाएं और हर पल बदलते अपडेट्स
मैं यह सब सुन… देख ही रहा था। पढ़ रहा था। कि आपके सामने क्या स्थिति रखूं। क्योंकि चीजें हर पल तेजी से अपडेट हो रही थीं। मैं लाइव भी नहीं जा सकता। क्योंकि लाइव जाने के लिए यूट्यूब पर कम से कम 50 सब्स्क्राइबर होने चाहिए। अपने अभी 24 ही हैं। इसलिए वीडियो बनाने और उसे लिखने के लिए जैसे ही बैठता वैसे ही कुछ न कुछ अपडेट हो जाता।
एकतरफा रिपोर्टिंग और सरकार की छवि पर असर
इंडियन एक्स्प्रेस की घटिया एक तरफा पत्रकारिता पर भी कुछ लिखना चाहता था लेकिन फिर वह आपका और मेरा समय बर्बाद करना ही होता कि भाई आप मैसेंजर को ही मार रहे हो। इंडियन एक्स्प्रैस को गरियाने से कुछ नहीं होता। उसका तो सरकार करती या करेगी यह वह जाने । क्योंकि उसकी एकतरफ रिपोर्ट से छवि सरकार की खराब हुई है। यह उसी को निपटना है। कैसे निपटेगी पता नहीं। देखते हैं।
30 सालों का पत्रकारिता अनुभव और निष्पक्षता का नियम
मैं खुद पत्रकार हूं। 30 वर्षों से प्रिंट, टीवी, डिजीटल तीनों माध्यम में रहा हूं। लेकिन कभी ऐसी पत्रकारिता नहीं की कि जिसके खिलाफ लिख रहा हूं या बोल रहा हूं उसका पक्ष ही ना लूं। चुनाव आयोग को लेकर इंडिया एक्सप्रैस की पूरी खबर में चुनाव आयोग या किसी आयुक्त का कोई पक्ष ही नहीं है। बस छाप दी। छापने के लिए। मुद्दा बनाने के लिए। हवा बनाने के लिए।
26 सितंबर की बैठक और टीवी मीडिया की टीआरपी
खैर, चुनाव आयोग ने कल यानि 26 सितंबर को मीटिंग बुलाई। हालांकि खबर छपने के दिन ही चुनाव आयोग ने प्रेस रिलीज कर बता दिया था कि उनके यहां कोई मतभेद नहीं है। जो भी फैसले लिए जाते हैं वे सर्व सम्मति से या बहुमत से लिए जाते हैं। फिर भी नेशनल टीवी मीडिया को लगा रहा कि नहीं चुनाव आयोग को प्रेस कॉन्फैंस करनी चाहिए। क्योंकि टीवी मीडिया को यही सूट करता है कुछ दिखे। टीवी स्क्रीन पर आग ना लगती दिखे तो मजा ही नहीं आता। टीआरपी ही नहीं आती। कागज लिखे में क्या पत्रकारिता करें। कोरा नीरस है। कोई उत्तेजना नहीं। पर चुनाव आयोग ने दिल्ली के टीवी मीडिया की नहीं सुनी।
चार पन्नों का प्रेस रिलीज: फॉर्म 6 और BLO सत्यापन की सच्चाई
तीनों आयुक्तों ने अपनी बैठक बुलाई। चर्चा की। और चार पेज का प्रैस रिलीज जारी कर दिया। साफ कर दिया कि SIR को लेकर फार्म 6 में संशोधन को सुप्रीम कोर्ट सही ठहरा चुका है। जिन लोगों को वोटर लिस्ट में नाम नहीें आया है। और उनको नोटिस मिला है। तो डॉक्यूमेंट वैरिफिकेशन के लिए BLO उनके पास आएगा और जरूरी सुधार कर वोटर लिस्ट में उनका नाम जोड़ेगा।
IIT/IIIT विशेषज्ञों की जांच कमेटी और गोवा वोटर्स का सच
आयोग के पोर्टल में क्षेत्रीय चुनाव निर्वाचन अधिकारियों के वैधानिक क्षेत्राधिकार की जो बात है उसके जांच के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई गई है। इसमें IIT या IIIT के विशेषज्ञ को रखा जाएगा। उसकी रिपोर्ट आने पर उचित कार्रवाई की जाएगी। गोवा के 97 वोटर्स का नाम नहीं जुड़ने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि 81 के नाम जुड़ चुके हैं बाकि प्रोसेस में है। जाहिर है इंडियन एक्स्प्रैस ने खबर छापने के साथ चुनाव आयोग का भी पक्ष साथ में लिया होता तो यह बवाल ही नहीं होता। लेकिन फिर एजेंडा कैसे चलता। जैसा 4 अप्रैल 2012 को भी चलाने की मंशा थी।
विपक्ष की बिसात और ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव
खैर तीर कमान से निकल चुका है। विपक्ष चुनाव आयोग के इस बयान को मानने वाला नहीं है। उसने अपनी बिसात बिछा ली है। उसका एजेंडा मोदी सरकार को वोट चोर साबित करना है जिसके लिए उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा चाहिए।
सरकार द्वारा पूर्व में लिए गए फैसले और समझौते
अब तक अपने को बचाने कि लिए मोदी सरकार शिक्षा मंत्री की बलि ले चुकी हैं। कानून और सुप्रीम कोर्ट की साख से भी खेल चुकी हैं। जब जंतर-मंतर पर पुलिस और अन्य लोगों पर हमला करने वाले लोगों के खिलाफ सरकार ने 13 FIR वापस ली थी। जब दिल्ली पुलिस की छाती पर चढ़कर कुछ लोगों ने पार्लियामेंट थाने में कुछ लोगों के खिलाफ SC/ST एक्ट में मुकदमा दर्ज करवा दिया था।
मुख्य चुनाव आयुक्त की ‘बलि’ और उसके दुष्परिणाम
लेकिन मामला अब गंभीर है। अपनी गद्दी बचाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त का पत्ता काटा या उसकी बलि ली तो मोदी सरकार सीधे कठघरे में खड़ी हो जाएगी। राहुल और विपक्ष यहीं नहीं रूकेगा। क्योंकि इस्तीफे से विपक्ष जनता में यह मैसेज देने में कामयाब रहेगा कि वोट जानबूझकर काटे गए। और जो 13 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से मीसिंग हैं वे सब कांग्रेस और विपक्षी दलों के वोटर थे। भाजपा का एक भी वोटर नहीं था।
राजनीतिक नैरेटिव की ताकत और जनमानस पर प्रभाव
हालांकि यह तकनीकि या किसी भी तरीके से संभव नहीं है। लेकिन विपक्ष यह नेरेटिव गड़ने में कामयाब रहेगा। और जब एक बार नेरेटिव गढ़ दिया जाता है। जनता के मन में बात बैठा दी जाती है तो 400 पार का नारा देने वाली सरकार 303 से खिसक कर 240 पर आ सिमटती है।
मोदी सरकार के लिए स्पष्ट चेतावनी
इसलिए मोदी सरकार इस गलतफहमी में ना रहे कि नेरेटिव नहीं गड़ा जा सकता। क्योंकि जब से वे सत्ता में आई है इस मामले में वह बहुत कमजोर साबित हुई है। इसीलिए जब वह इसमें नाकाम रहती है तो वह अपने मंत्री और संस्थाओं की बलि ले लेती है। लेकिन इस बार यह गलती मत कर बैठना बलि लेन की। क्योंकि विपक्ष कमर कसके बैठा है। दिल्ली हथियाने के लिए। वोट से उससे नहीं होगा। उसे पता है।…और यह किससे होगा यहां यह बताने की जरूरत नहीं है। सबको पता है। धनिये यानि तिलचट्टों और योगन्द्र यादव इशारा कर चुके है।
