घनेन्द्र सिंह सरोहा का राजनीतिक विश्लेषण
नई दिल्ली, 10 सितंबर। मोदी को या तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। या वे सबकुछ हल्के में ले रहे हैं। उन्हें शायद कुछ अंदाजा ही नहीं हो रहा है कि उनका मुकाबला किससे है। इतना तो मैं समझता हूं कि मुकाबले में वे…. राहुल गांधी को तो नहीं ले रहे होंगे। मैं दोनों चीजों को साथ नहीं करना चाहता था। लेकिन ये दोनों हो गईं। शायद समय का यही तकाजा है। जब घटनाओं को कड़ी में पिरोया जाता है तो उसमें से मैसेज निकलता है। जिसको पढ़ने वाले पढ़ लेते हैं। और कुछ पढ़कर भी नजरअंदाज कर देते हैं। मोदी यही गलती कर रहे हैं। और लगातार कर रहे हैं। घटनाएं उन्हें लगातार मैसेज दे रही हैं। लेकिन वे अपनी धुन में हैं। होता है जब बंदा सत्ता के शिखर पर होता है तो उसे लगता है वह जो सोचता है वही सही है। और वह चीजों को बिखेरने से पहले संभाल लेगा। लेकिन जब चीजें हाथ से निकल जाती हैं तो वह क्या करता है, यह बताने की जरूरत नहीं है कि दुनिया के दिग्गजों ने क्या किया जब वे ऐसे हालात से अकेलेपन की दुनिया में चले गए।
सत्ता में बैठे व्यक्ति की गलती का असर करोड़ों लोगों पर पड़ता है
समस्या यह नहीं है कि वे अकेले कहां जाते हैं। लेकिन समस्या उन लाखों, करोड़ों लोगों की हो जाती है जो उनके भरोसे हो जाते हैं। उनके भरोसे बैठ जाते हैं। और फिर ऐसे अंधियारे में चले जाते हैं कि फिर से उन्हें उठने में कई सदियां और पीढ़ियां लग जाती हैं। शायद वे इसके लिए अभिशप्त हैं। किसी के भरोसे बैठने के। उसी को अपना सबकुछ मान लेने के और उसी को उनकी लड़ाई लड़ने देने के लिए। यानी यूं कह लीजिए कि वे लीडरशिप का काम ठेके पर दे देते हैं। कि भाई या बहन तू देख सही क्या है गलत क्या है… हम अपनी जिंदगी देख रहे हैं।
12 साल की सत्ता के बाद भी रामराज्य का सवाल
मोदी देश के 100 करोड़ सनातनियों के साथ यही करने जा रहे हैं। 12 साल से सत्ता में हैं। अच्छे काम किए हैं। कश्मीर को अंदर कर लिया है। राम मंदिर बना दिया है। भारतीय न्याय संहिता लाई।
जनता सिर्फ सड़क, पुल और योजनाओं के लिए सत्ता नहीं सौंपती
लेकिन उसके बाद फिर कुछ खास नहीं। देश की बहुसंख्यक जनता मोदी को सड़क बनाने, पुल बनाने, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सत्ता में नहीं लाई थी। वह बहुसंख्यक आबादी को रामराज्य महसूस कराने के लिए लाई थी। रामराज्य तो छोड़िए मोदी साहब अपनी गद्दी बचाने के लिए सामान्य राज्य तंत्र भी संभाल नहीं पा रहे हैं।
सत्ता के साथ बढ़ती असुरक्षा की भावना पर सवाल
वे बहुत ज्यादा डर गए हैं। और डर रहे हैं। होता है। लंबे समय तक जब कोई राज करता है ना तो बंदे में असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। और बहुत गहरे तरीके से अंदर तक धंस जाती है। कि उसे अपनी छाया से ही डर लगने लगता है। लेकिन मोदी इस डर के चक्कर में। अपनी गद्दी बचाने के चक्कर में… हो क्या रहा है ना कि वे अपने किले की दीवारें ही ढहाने में लग गए हैं। अपने मुख्य सेनापतियों की बलि देने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं।
जब सेनापति ही खत्म हो जाएंगे तो रक्षा कौन करेगा
मेरा सवाल यही है मोदी जी जब सेनापति ही निपट जाएंगे तब आप क्या करेंगे। कैसे अपनी रक्षा करेंगे। अब मैं आपको बताता हूं कि मामला क्या है।
13 मुकदमों की वापसी को लेकर गंभीर सवाल
मोदी जी आपने अपनी गद्दी बचाने के लिए सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट से कहकर तिलचट्टों के खिलाफ 13 मुकदमे वापस ले लिए। चलो कोई नहीं। लेकिन आर्टिकल 21 का क्या। संविधान के आर्टिकल 21 के अनुसार राज्य और सुप्रीम कोर्ट पर देश के हर नागरिक की दैहिक सुरक्षा करने की जिम्मेदारी होती है। तिलचट्टों ने देश के ही नागरिक जो कि पुलिस वाले हैं और अन्य लोगों पर हमला किया। लेकिन राज्य यानी मोदी सरकार ने आर्टिकल 21 को रौंदते हुए तिलचट्टों के खिलाफ मुकदमे वापस ले लिए। इस कृत्य में सुप्रीम कोर्ट भी भागी बना। उसने आर्टिकल 142 का हवाला देते हुए राज्य यानी मोदी सरकार की हां में हां मिला ली। आर्टिकल 21 की व्याख्या, उसका इकबाल बनाए रखना तो दूर उसको जमींदोज कर दिया। यह काम सुप्रीम कोर्ट का था।
संविधान को भी सत्ता की रक्षा में बलि देने का आरोप
इस तरह मोदी ने अपने को बचाने के लिए एक लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण पिलर संविधान नाम के सेनापति की बलि ली।
दिल्ली पुलिस पर भीड़ के दबाव का सवाल
फिर उसने अपने दूसरे सेनापति पुलिस की बलि तब ली जब गिनती के कुछ तिलचट्टों की भीड़ दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने पर जा चढ़ी और दिल्ली पुलिस के सीने पर पैर रखकर बोला कि मुकदमे में SC/ST धारा लगाओ। और आरोपी को अभी गिरफ्तार करो। पुलिस ने भीड़ के कहने पर दोनों काम किए। SC/ST Act की धारा भी लगाई। और उस चमन सी बकलोल को गिरफ्तार भी किया।
पुलिस कार्रवाई और संस्थाओं की भूमिका पर सवाल
मोदी जी आपको क्या लगता है। तिलचट्टों के कहने पर आपने एक मंत्री की बलि ली। फिर आर्टिकल 21 की, जो देश के हर नागरिक को उसकी देह यानी शरीर की सुरक्षा की गारंटी देता है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट भी सहभागी बना। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश चाहते तो आर्टिकल 142 का उपयोग नहीं करते और मोदी सरकार को साफ मना कर देते कि यह तुम्हारा फैलाया हुआ रायता है। अब तुम ही इसको समेटो। तुमने क्या हमसे पूछकर मुकदमे वापस लेने का वायदा किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा नहीं किया।
इंडिया गेट पर प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट को उलट… तिलचट्टों के लिए आर्टिकल 19B का एकदम ध्यान आ गया कि उन्हें 5 सितंबर को इंडिया गेट पर कथित शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार है। तिलचट्टों के प्रदर्शन पर रोक लगाने की याचिका को तकरीबन खारिज करते हुए कहा कि शांति व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की है। और यहां भी देश की संस्थाओं ने ही नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। कल तक सुप्रीम कोर्ट जंतर-मंतर की जगह रामलीला मैदान या दिल्ली में कहीं और प्रदर्शन करने की याचिका सुन रहा था और अब यहां इंडिया गेट पर उसे कोई आपत्ति नहीं है। इंडिया गेट कब से विरोध प्रदर्शन करने की जगह बन गया, यह केन्द्र सरकार, दिल्ली पुलिस या सुप्रीम कोर्ट ही बता सकता है।
2012 के निर्भया आंदोलन का संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है
मैं इंडिया गेट पर इतना जोर इसलिए दे रहा हूं क्योंकि आप गूगल में “निर्भया इंडिया गेट या विजय चौक प्रदर्शन 2012” सर्च कीजिए। आपको सारी हकीकत पता चल जाएगी कि कैसे शांतिपूर्वक प्रदर्शन के नाम पर कथित छात्रों, वामपंथियों और देश विरोधी ताकतों ने करीब 15 दिनों तक देश की राजधानी में कोहराम मचाया था। पुलिस की गाड़ियों पर सवार उत्पाती भीड़ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने एक पखवाड़े तक डटी रही।
अब घटनाओं की कड़ियों को जोड़ने की कोशिश
अब मैं कड़ियां जोड़ता हूं… जिसके लिए मैं शुरू में कह रहा था कि मैं दोनों घटनाओं को जोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन यह हो गया।
श्रीराम कॉलेज के कार्यक्रम के बाद दिल्ली में इमारत हादसा
मोदी जी दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉमर्स कॉलेज जाते हैं और जैन जी को संबोधित करते हैं। इसके अगले ही दिन फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के सामने एक 5 मंजिला इमारत गिरती है। उसमें 7 जैन जी दबकर मर जाते हैं और कई गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।
वडोदरा में Gen Z के बीच मोदी का कार्यक्रम और रील्स
और फिर मोदी जी आज फिर बड़ोदरा में जैन जी के सामने धुरंधरा गाने के साथ रैंप पर चलते हैं और हजारों जेन जी के मोबाइल की रील बन जाते हैं।
तीन घटनाओं के बीच क्या संदेश निकलता है
आपने कुछ बात नोटिस की। श्रीराम कॉमर्स कॉलेज का कार्यक्रम। फिर 7 जैन जी बच्चों की मौत और फिर मोदी जी का बड़ोदरा में जेन जी बच्चों के साथ कार्यक्रम।
क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को ये घटनाएं दिखाई नहीं देतीं
इसमें कहीं कुछ चूक नहीं रहा है। कुछ मर नहीं रहा है। सड़ नहीं रहा है। टूट नहीं रहा है। सिमट नहीं रहा है। खत्म नहीं हो रहा है। हां, हो रहा है। हम सब के लिए हो रहा है। लेकिन जो सत्ता के शीर्ष पर बैठा होता है ना…. उसे यह सब नजर नहीं आता है। दिखाई नहीं देता है। और दिखाई भी देता होगा तो वह आंख फेर लेता है क्योंकि उसका निशाना सत्ता की चाबी यानी चुनाव पर होता है।
हादसों की पुरानी घटनाएं भी सवालों के घेरे में
क्योंकि उसे लगता है कि अभी कुछ महीने पहले जून में लखनऊ में भी तो 15 जेन जी कोचिंग संस्था में जलकर मरे थे। और जून में ही दिल्ली के मालवीय नगर में एक होटल में आग लगी थी जिसमें 22 लोग जलकर मर गए थे। दिल्ली में ही बारिश के दौरान करंट लगने और बेसमेंट में पानी भरने पर डूबने से UPSC की तैयारी कर रहे 4 बच्चे मर गए थे। बच्चे क्या है। मरते रहते हैं। लोग क्या है। मरते रहते हैं। क्या ही फर्क पड़ता है। और लोग भूल जाते हैं।
सत्ता की यही सोच अब सोशल मीडिया के दौर में चुनौती बन गई है
सही कहा सत्ता ने…. लोग भूल जाते हैं।
रील्स पुराने हादसों को दोबारा सामने ला रही हैं
लेकिन चक्कर क्या है ना कि रील्स अब भूलने नहीं देती हैं। वह इतिहास के गढ़े मुर्दे उखाड़ लाती है। और सतह पर आते ही बुरी तरह सड़ांध मारते सिस्टम को उखाड़ फेंकने के लिए उसकी देहरी पर आ खड़ी होती है।
सोशल मीडिया सरकारों से पुराने वादों का हिसाब मांगता है
रील्स यह भी याद दिलाती है कि भाई आप लोग डबल इंजन की सरकार…. ट्रिपल इंजन की सरकार की दुहाई देकर सत्ता में आए थे। रामराज्य तो दूर…. जनता के जान के लाले पड़ गए हैं। कब कौन कहां, कैसे मर जाए। कोई नहीं जानता।
अब सिस्टम बदलने के लिए आउटसोर्सिंग का सुझाव
ऐसा है मोदी जी मैं आपको साफ-साफ कहता हूं। पता नहीं आपको अभी तक किसी ने कहा होगा या नहीं।
लेकिन मैं आपको बता देना चाहता हूं कि …..आप रामराज्य तो बाद में लाना… पहले अगर यह सिस्टम सुधारना है तो जनता की सेवा से जुड़े तकरीबन हर कार्य को आउटसोर्स कर दो। हैवी पेनल्टी के साथ जब काम प्रोफेशनल एजेंसियों के पास जाएगा तो सबकुछ ठीक हो जाएगा।
Gen Z और Gen Alpha की उम्मीदों के मुताबिक तकनीक जरूरी
दूसरा, जिस तरह से डिजिटल क्रांति और AI ने जेन जी और जेन अल्फा की उम्मीदों में तेजी से पंख लगाए हैं तो आपको भी इसी सिस्टम और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए लोगों की मुश्किल खड़ी होने से पहले ही उनकी समस्याओं का समाधान करना होगा।
सरकार को समस्या से पहले कदम उठाने होंगे
सरकार को एडवांस स्टेप पहले ही लेने होंगे। सरकारी सेवाओं और कार्यों का निजीकरण सड़क, बिजली, जलापूर्ति, कचरा संग्रहण आदि कार्यों में पहले ही हो चुके हैं।
निजी एजेंसियों की जवाबदेही तय करने का सुझाव
सरपंच, प्रधान, विधायक, सांसद की जनहितैषी सिफारिशों के क्रियान्वयन के लिए हैवी फाइनेंशियल पेनल्टी के साथ निजी एजेंसियों को हायर करो ताकि गड़बड़ करने पर उनसे पैसा वसूला जा सके और देश के आम नागरिक को किसी भी तरह का शारीरिक या मानसिक नुकसान हो तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नियत समय में शुरू हो और खत्म हो।
नौकरशाही को धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी से बदलने का सुझाव
नौकरशाही को जितना हो सके धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी से रिप्लेस करो। क्योंकि टेक्नोलॉजी ही जेन जी, जेन अल्फा की सरकार से उम्मीदों की स्पीड को पकड़ पाएगी, नौकरशाही नहीं।
BNS आने के बाद भी भ्रष्ट सिस्टम पर सवाल
दूसरा, आप BNS यानी भारतीय न्याय संहिता तो ले आए लेकिन सिस्टम वही भ्रष्ट पुराना चल रहा है। मोदी जी भ्रष्ट नौकरशाह रोज रिश्वत लेते हुए पकड़े जा रहे हैं। लेकिन कितनों को सजा हुई। कितनों से वसूली हुई। ना के बराबर।
कानून का राज जमीन पर दिखाई देना जरूरी
कानून का राज दिखेगा नहीं तो रोज नीट जंतर-मंतर होंगे। और कुछ नहीं तो योगी जी से ही सीख लीजिए। कानून का मतलब क्या होता है। और वह बिना संस्थागत सेनापतियों की बलि दिए अच्छी संख्या में जीताऊ वोट भी दिलाता है।
अब पुलिस और कोर्ट की पारदर्शिता पर निवेश की जरूरत
सड़क, रेल, पुल, सरकारी योजनाओं, राशन पर तो आपने पैसा बहुत लगा लिया। अब आप कानून के जमीनी सिस्टम, पुलिस, कोर्ट की ट्रांसपेरेंसी और जवाबदेही पर पैसा और टेक्नोलॉजी लगाइए।
जमीन और खनन माफियाओं पर सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत
और हां, जमीन, मकान, फ्लैट की रजिस्ट्रियों, कब्जों, बजरी और खनन माफियाओं पर सर्जिकल स्ट्राइक करने की सबसे ज्यादा जरूरत है।
कानून हैं, अब टेक्नोलॉजी से उनका अमल जरूरी
कानून तो बहुत बने हुए हैं। टेक्नोलॉजी और प्रोफेशनल एजेंसियों से उसे अमल में लाइए। सड़ी हुई भ्रष्ट नौकरशाही से नहीं होगा।
