- अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट की गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने मांगे सुझाव और दस्तावेजी सबूत; पर्यावरणविदों से लेकर किसानों और खनन प्रभावित समुदायों तक सभी पक्षों को अपनी राय रखने का मौका
नई दिल्ली, 21 जुलाई। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और इसके पर्यावरणीय संरक्षण को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। अदालत द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने अरावली क्षेत्र से जुड़े सभी प्रमुख पक्षों से सुझाव, आपत्तियां और दस्तावेजी साक्ष्य मांगे हैं।
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब 100 मीटर ऊंचाई के मानदंड को लेकर पर्यावरणविदों और अन्य विशेषज्ञों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं। आशंका है कि इस मानदंड के कारण अरावली पर्वतमाला का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है।
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कौन-कौन रख सकता है अपनी बात?
समिति ने अरावली से जुड़े विभिन्न पक्षों को अपनी राय और आपत्तियां रखने का अवसर दिया है। इनमें शामिल हैं—
- पर्यावरणविद् और संरक्षणवादी
- गैर-लाभकारी संगठन
- खनन क्षेत्र से जुड़े हितधारक
- परियोजनाओं के समर्थक
- ग्रामीण और किसान
- खनन श्रमिक
- अरावली क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय समुदायजैव विविधता और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञ
समिति के अनुसार, दस्तावेजी साक्ष्य या सत्यापन योग्य सामग्री के साथ दिए गए सुझावों को आधिकारिक Google Form के माध्यम से जमा किया जा सकता है।
समय सीमा
सुझाव और आपत्तियां नोटिस जारी होने के 21 दिनों के भीतर जमा करनी होंगी।
100 मीटर की परिभाषा पर क्यों उठे सवाल?
अरावली विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा इसकी नई परिभाषा को लेकर है। प्रस्तावित मानदंड में 100 मीटर की ऊंचाई को महत्वपूर्ण आधार माना गया था।
आलोचकों का कहना है कि यदि केवल 100 मीटर की ऊंचाई को आधार बनाया गया, तो अरावली पर्वतमाला का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है।
ऐसी स्थिति में पर्यावरणविदों को आशंका है कि—
“संरक्षित क्षेत्र से बाहर आने वाले इलाकों में निर्माण और खनन गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है।”
यही वजह है कि इस परिभाषा को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने बनाई उच्चाधिकार प्राप्त समिति
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गहन जांच के लिए भारतीय वन सेवा की पूर्व अधिकारी और भारतीय वन एवं शिक्षा परिषद यानी ICFRE की पूर्व महानिदेशक कंचन देवी की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया है।
समिति को अक्टूबर 2025 की एक रिपोर्ट में सामने आई महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं की जांच करने का दायित्व सौंपा गया है।
समिति की रिपोर्ट कब आएगी?
समिति को अपनी व्यापक रिपोर्ट 31 अगस्त तक सुप्रीम कोर्ट में पेश करनी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश पर भी किया पुनर्विचार
अरावली की परिभाषा को लेकर उठे विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने पहले के आदेश पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिका को स्वीकार किया।
इस पीठ में—
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी
न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
शामिल थे।
अदालत ने माना कि प्रस्तावित परिभाषा को लेकर उठाई गई आपत्तियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोट अनकोट: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
“सार्वजनिक असहमति और आलोचना प्रस्तावित परिभाषा में मौजूद अस्पष्टता और स्पष्टता की कमी से उत्पन्न होती प्रतीत होती है।”
अदालत ने यह भी माना कि प्रस्तावित परिभाषा की गलत व्याख्या से पर्यावरण और अरावली क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
समिति को अब यह स्पष्ट रूप से निर्धारित करना होगा कि—
- अरावली का वास्तविक क्षेत्र कितना है?
100 मीटर के मानदंड के कारण कौन-कौन से क्षेत्र अरावली की परिभाषा से बाहर हो जाएंगे, इसकी पहचान की जाएगी।
- क्या खनन और विकास गतिविधियां संभव हैं?
समिति यह जांचेगी कि अरावली पर्वतमाला के भीतर स्थायी खनन और अन्य विनियमित गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है या नहीं।
- कौन से क्षेत्र नियामकीय निगरानी से बाहर रह सकते हैं?
ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जाएगी जहां संरक्षण संबंधी नियम लागू नहीं हो पाएंगे।
- पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा?
समिति को यह भी देखना होगा कि निगरानी से बाहर रहने वाले क्षेत्रों में निर्माण या खनन से भविष्य में किस तरह के पर्यावरणीय नुकसान हो सकते हैं।
अरावली की लड़ाई सिर्फ पहाड़ों की नहीं, भविष्य की भी है
अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियों की एक श्रृंखला नहीं है। यह उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसीलिए इस पूरे विवाद का असर केवल खनन या निर्माण गतिविधियों तक सीमित नहीं है। यह सवाल सीधे तौर पर—
भूजल, जंगल, जैव विविधता, स्थानीय समुदायों की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ है।
अब सुप्रीम कोर्ट की समिति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
क्या 100 मीटर का मानदंड अरावली के संरक्षण के लिए पर्याप्त है?
क्या इससे अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएगा?
और क्या नई जांच के बाद अरावली की परिभाषा बदल सकती है?
इन सभी सवालों का जवाब अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट से मिलने की उम्मीद है।
