- घनेन्द्र सिंह सरोहा
नई दिल्ली। IAS दिव्या मित्तल के इस्तीफे और पीएम मोदी को मां की गाली देने वाली 15 साल की बच्ची के नए वीडियो के वायरल होने की घटनाओं के बीच एक विषय जो बुनियादी तौर पर भारत की राजनीति की जमीन पर उबाल भर रहा है, वह है आरक्षण का। और यह इतना गंभीर है कि आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बीजेपी की हालत उस नटनी की तरह हो गई है जो एक तनी हुई रस्सी पर चल रही है और हाथ में पकड़े हुए बांस के एक छोर पर सवर्ण और ओबीसी हैं तो दूसरे छोर पर SC/ST समाज है। इसमें से बीजेपी एक छोर की ओर ज्यादा झुके तो दूसरा गया और दूसरे की ओर ज्यादा झुके तो पहला गया। बीजेपी से ना निगलते बन रहा है और ना ही उगलते। सांप-छछूंदर वाली स्थिति हो गई है। और इन्ही हालात में उसे अगले साल अप्रैल में होने वाले यूपी चुनाव की गंगा भी पार करनी है।
5 और 7 सितंबर की तारीखें: आंदोलनों की आहट और घमासान के संकेत
बीजेपी का बैलेंस बिगाड़ने के लिए ‘तिलचट्टों की सीजेपी’ और ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ यानी RHA भी मैदान में हैं। तिलचट्टों ने 5 सितंबर को दिल्ली चढ़ाई की घोषणा की है, तो RHA इसके दो दिन बाद यानी 7 सितंबर को बताएगा कि सरकार से उसे क्या मिला। इसका सीधा मतलब है कि अगले कुछ दिन देश की राजनीति में जमकर घमासान होना तय है।
एनडीए के भीतर जंग: चिराग पासवान बनाम जीतन राम मांझी
आरक्षण की आंच इतनी तेज है कि एनडीए के घटक दल की दो अलग-अलग पार्टियों के नेता और केंद्र में मंत्री एक-दूसरे का इस्तीफा मांगने लगे हैं। यहाँ विपक्ष इस्तीफा नहीं मांग रहा, बल्कि ये लोग आपस में ही एक-दूसरे का इस्तीफा मांग रहे हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान कह रहे हैं कि SC/ST में कोई फाड़ (वर्गीकरण) या क्रीमी लेयर लागू नहीं होने दी जाएगी, जबकि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और अब केंद्र में मंत्री जीतन राम मांझी का कहना है कि फाड़ होनी ही चाहिए, तभी इस वर्ग के बाकी पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ मिलेगा। उल्लेखनीय है कि पासवान SC वर्ग की उच्च जाति से आते हैं जबकि मांझी महादलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और केंद्र का रुख: हलफनामे के बाद उभरा नया विवाद
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब दोनों मंत्री आपस में लड़ रहे हैं, जबकि हरियाणा, पंजाब, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में SC कोटे के भीतर वर्गीकरण पहले ही हो चुका है। यह सब सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संवैधानिक पीठ के 1 अगस्त 2024 के ऐतिहासिक फैसले के बाद हुआ। 6-1 के बहुमत से पीठ ने राज्यों को अधिकार दे दिया कि वे SC/ST में वर्गीकरण, क्रीमी लेयर या न्यायसंगत पैमाने बना सकते हैं। अब बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? मोदी सरकार ने 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे दिया कि वह SC/ST आरक्षण में कोई बदलाव नहीं करने जा रही है। लेकिन इस हलफनामे के 20 दिन बाद, 26 अगस्त को मोदी सरकार ‘आरक्षण हटाओ’ आंदोलनकारियों से मिलती है और आगे भी मिलते रहने की बात कहती है। यहीं से असली विवाद की मवाद फूट पड़ी है।
यूपी चुनाव का समीकरण और परंपरागत वोट बैंक को बचाने की चुनौती
अब मोदी सरकार की मुश्किल यह है कि यूपी में 20 प्रतिशत वोटर अगड़े वर्ग से आते हैं। बिहार की बांकीपुर सीट से अगड़ों ने प्रशांत किशोर को जिता कर बीजेपी को मैसेज दे दिया कि अब बहुत हो गया। बनिया और ब्राह्मण बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक रहे हैं और पार्टी इसे किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहती। इस बीच राहुल गांधी भी अपनी ‘दलित शुद्धिकरण’ की फुलझड़ी लेकर घूम रहे हैं, हालांकि सरकार उन्हें लेकर बहुत गंभीर नहीं है क्योंकि वे मुद्दों को पकड़ते और छोड़ते रहते हैं, किसी एक पर टिकते नहीं हैं।
2014 से 2020 तक का दौर: वादों, फैसलों और झटकों की टाइमलाइन
मोदी सरकार भी सोचती होगी कि कहां आकर फंस गए, किया-धरा किसी और का है और समेटना उनको पड़ रहा है। वास्तव में यह सब होना ही था। सच्चाई यही है कि मोदी सरकार कांग्रेस के घोटालों, लोकपाल, अन्ना आंदोलन और लोगों की असीमित उम्मीदों पर सवार होकर 2014 में सत्ता में आई थी। खाते में 15 लाख और 40 रुपये पेट्रोल की उम्मीदों के बीच आम जनता को सितंबर 2016 में असली आजादी तब मिली जब जियो का फ्री डेटा फोन मिला। इसके बाद नवंबर 2016 में नोटबंदी, 2017 में जीएसटी, 2018 में आयुष्मान भारत, 2019 में किसान सम्मान निधि, बालाकोट एयरस्ट्राइक और धारा 370 का हटना जैसे फैसले सामने आए। जनता एक झटके से उबरती तो दूसरा आ जाता था, और इसी बीच 2020 में कोरोना महामारी आ गई।
7. 1989 से 2026 का चक्र: डिजिटल क्रांति से उपजा सड़क का जनाक्रोश
आरक्षण का यह मुद्दा 2026 में उठना ही था; जैसे 1989 का दौर मंडल कमीशन और OBC का था, वैसे ही 2026 ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का समय बन गया। कोरोना के बाद दुनिया पूरी तरह ऑनलाइन हो गई—यह हम सबका डिजिटल अवतार में प्रवेश था। इसके बाद चीन गलवान टकराव, किसानों का आंदोलन, अग्निपथ योजना का विरोध, CAA/NRC, राम मंदिर स्थापना, SIR और अब चीफ जस्टिस की तिलचट्टे वाली टिप्पणी के बाद जंतर-मंतर का मंजर सबने देखा। शुरुआत के 5 साल जनता मोदी सरकार के सम्मोहन में थी। 2016 में जियो फोन के रूप में जो हथियार मिला था, उसकी ट्रेनिंग कोरोना काल में रील्स बनाकर पूरी हुई। 2019 से 2024 के बीच यही जनता रील्स के दम पर सड़कों पर उतरने लगी, और 2026 में रील्स के बारूद पर बैठी जनता के बीच चीफ जस्टिस की टिप्पणी ने चिंगारी का काम किया।
राजनीतिक अनिश्चितता: घरेलू मोर्चे पर घिरी सरकार के आगे क्या?
आज नज़ारा सबके सामने है। आरक्षण चाहने वाले और आरक्षण का विरोध करने वाले, दोनों सड़कों पर हैं और सरकार दोनों से बात कर रही है। इतिहास में शायद ही किसी सरकार के सामने ऐसी स्थिति रही हो जहाँ विपक्ष की जगह खुद मंत्री ही एक-दूसरे का इस्तीफा मांगने लगे हों और केंद्र को चुपचाप तमाशा देखना पड़े। सरकार किसी एक का पक्ष नहीं ले सकती क्योंकि किसी भी तरफ झुकने पर बड़ा राजनीतिक नुकसान तय है। 5 सितंबर और 7 सितंबर के बाद यह सिलसिला यूं ही आगे बढ़ता रहेगा। मोदी सरकार अब जलते तवे पर बैठी है, जहाँ उसे मोबाइल क्रांति से लैस आम लोगों और राजनेताओं के हमलों को झेलना होगा। अब पाकिस्तान या चीन का नहीं, बल्कि 65 रुपये किलो चीनी, 20 रुपये इथेनॉल और बेरोजगारी जैसे घरेलू मुद्दों का दौर है जो सीधे सरकार पर वार कर रहे हैं।
