सीनियर रिपोर्टर- श्रीमती भगवती जोशी
फतहनगर, 19 सितंबर। “नामांकन वापसी का समय खत्म हो चुका है… मैदान पूरी तरह साफ है, लेकिन फतहनगर-सनवाड़ में खेल बड़ा दिलचस्प मोड़ ले चुका है! एक तरफ बीजेपी की अधिकृत प्रत्याशी सीमा सोनी हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी के ही बागी नेता राजेश चपलोत की पत्नी ममता चपलोत निर्दलीय मैदान में हैं! यानी ‘कमल’ के निशान पर चुनाव लड़ने वाले दो चेहरे आज आमने-सामने खड़े हैं… आखिर बहुमत होने के बाद भी बीजेपी इस दलदल में क्यों फंसी? आइए समझते हैं इस पूरी इनसाइड स्टोरी को!”
“राजनीति के भी क्या-क्या रंग होते हैं! अगर राजेश चपलोत बागी नहीं हुए होते, तो अब तक सीमा सोनी निर्विरोध अध्यक्ष चुन ली गई होतीं और फतहनगर-सनवाड़ में बीजेपी का बोर्ड बन चुका होता। क्यों? क्योंकि कांग्रेस की दावेदार सोसर ने तो अपना नाम पहले ही वापस ले लिया था!
लेकिन अफसोस… फतहनगर-सनवाड़ में बीजेपी बहुमत में होकर भी अपने ही बागियों से परेशान है, तो वहीं दूसरी तरफ मावली में पार्टी एक निर्दलीय और एक क्रॉस-वोटिंग के जुगाड़ में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।”
“कल के मेरे वीडियो पर कुछ दर्शकों ने सवाल उठाया कि— ‘जब फतहनगर में अध्यक्ष पद की सीट जनरल महिला के लिए आरक्षित थी, तो बीजेपी ने ओबीसी महिला को प्रत्याशी क्यों बनाया?’ भाई साहब, सीधी सी बात है! यह पार्टी का अंदरूनी फैसला है कि वह जनरल सीट पर जनरल को उतारे, ओबीसी को या SC/ST उम्मीदवार को। उदाहरण देखिए— वार्ड 20 से बीजेपी महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष ऋतु अग्रवाल प्रबल दावेदार थीं। लेकिन पार्टी ने वरिष्ठ नेता गणपत सोनी की बहू सीमा सोनी को टिकट दिया। ऋतु ने बिना किसी गिले-शिकवे के पार्टी के फैसले को सिर-माथे लिया और निष्ठा दिखाई।”
“लेकिन दूसरी तरफ देखिए… वार्ड 22 से बीजेपी के बागी गजेंद्र सिंह रावल नहीं माने। उन्होंने बगावत करके चुनाव लड़ा और नतीजा? पार्टी के सम्मानित नेता कल्याण सिंह पोखरना को हार का सामना करना पड़ा!
अब जरा सोचिए… जो लोग आज ओबीसी-जनरल का ज्ञान बांट रहे हैं, उन्होंने तब विरोध क्यों नहीं किया जब ऋतु अग्रवाल की जगह सीमा सोनी को टिकट दिया गया था? अगर इतना ही विरोध था, तो गजेंद्र रावल की तरह बिना ‘कमल’ के निशान के चुनाव लड़ते! लेकिन तब तो चुनाव जीतने के लिए पार्टी का सिंबल ‘कमल’ चाहिए था… और अब सत्ता की मलाई दिखते ही निष्ठा भूल गए! सच में, यह सत्ता क्या-क्या न कराए!”
“लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सब तमाशा शुरू ही क्यों हो रहा है?
इस सारे खेल की जड़ है— 2019 में आई तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार का एक फैसला! गहलोत सरकार एक ऐसा नियम लेकर आई कि कोई भी आम इंसान, जिसने नगर निकाय का चुनाव तक नहीं लड़ा हो, वह भी शहर का अध्यक्ष/मेयर बन सकता है! बस उसे चुने हुए पार्षदों का समर्थन चाहिए। और हद तो यह है कि अध्यक्ष बनने के बाद भी उसे 6 महीने में चुनाव जीतने की कोई बाध्यता नहीं है!
अब आप ही बताइए… यह कहाँ का लोकतंत्र है? जिसे जनता ने वार्ड पार्षद तक नहीं चुना, वह पूरे शहर के भाग्य का फैसला करेगा?”
“लोग अक्सर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का उदाहरण देते हैं कि वे बिना चुनाव लड़े 10 साल देश के पीएम रहे। लेकिन भाई साहब, वे राज्यसभा के सांसद थे! नगर निकायों में क्या कोई ऊपरी सदन होता है? जवाब है— नहीं! तो फिर एक गैर-जनप्रतिनिधि को जनता के सिर पर क्यों बिठाया जा रहा है?
चुनाव के वक्त तो नेताओं को ‘बाहरी’ बताकर टिकट काट दिया जाता है, और चुनाव जीतते ही सत्ता के भूखे लोग दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को भी गले लगाने को तैयार हो जाते हैं! राजनीति कीजिए, लेकिन क्या इतना गंदा खेल जरूरी है कि कल एक-दूसरे से नजरें भी न मिला सकें?”
“कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा कह रहे हैं कि ‘भजनलाल सरकार पुलिस का इस्तेमाल करके कांग्रेस पार्षदों को धमका रही है और इससे प्रदेश में खून-खराबा हो जाएगा।’ गोविंद जी भाई साहब! यह जो बबूल का पेड़ आज कांट रहा है, इसका बीज 2019 में आपकी ही सरकार ने बोया था। आज बीजेपी मौका देखकर उसे काट रही है, कल आपकी बारी आएगी तो आप कौन सा पीछे हटेंगे?
और यह बीमारी सिर्फ राजस्थान या स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना और NCP जैसी पार्टियां इसे भुगत रही हैं। पार्टियां टूट चुकी हैं, सिंबल के लिए सुप्रीम कोर्ट की 3-सदस्यीय खंडपीठ में सुनवाई चल रही है।”
“दल बदल विरोधी कानून के तहत देश में सांसद या विधायक अगर पार्टी लाइन के खिलाफ वोट करते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द हो जाती है । ठीक यही कानून सुप्रीम कोर्ट और भजनलाल सरकार को पंचायती राज और नगर निकाय चुनावों में भी तुरंत लागू करना चाहिए!
क्योंकि स्थानीय चुनाव बहुत व्यक्तिगत स्तर पर होते हैं। यहाँ हर मोहल्ले का इंसान एक-दूसरे को जानता है, रोज साथ उठना-बैठना होता है। सत्ता के इस गंदे खेल की वजह से पड़ोसियों और समाज के बीच जो जहर, ईर्ष्या और दुश्मनी घुल रही है, वह हमारे सामाजिक ताने-बाने के लिए बहुत खतरनाक है। भारतीय समाज त्याग और सद्भावना पर टिका है, आपसी कटुता पर नहीं!
आपको बता दूं— केरल, पश्चिम बंगाल और गोवा में स्थानीय निकायों के लिए दल-बदल कानून लागू है। भजनलाल सरकार को भी बिना देर किए इस दिशा में कड़ा कदम उठाना चाहिए।”
“इस पूरे मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या नगर निकायों में भी दल-बदल विरोधी कानून लागू होना चाहिए? कमेंट करके अपनी राय जरूर बताएं।
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मैं ‘नेताजी का रिपोर्ट कार्ड’ से भगवती कुमारी जोशी।
जय भारत, जय हिन्दुस्थान!”
