एक्चुअली होता क्या है कि जैसा हम होते हैं वैसा ही हम सोचते हैं कि दूसरा भी वैसा ही होगा। हम जितने मजबूत होंगे तो सोचेते हैं कि जिससे हमारा मुकाबला है वह भी उतना ही मजबूत होगा। इस बात को तब और बल मिलता है जब सामने वाला प्रोपेगेंडा बनाने में मास्टर हो। माहौल बनाने में उस्ताद हो। जब वह माहौल बनाता है तो हम घबरा जाते हैं कि इससे कहीं हमारा नुकसान ना हो जाए लेकिन जब कुछ समय बाद देखते हैं कि वह दरक रहा है। खिसक रहा है। उसका हवा का गुब्बारा धीरे-धीरे फुस्स हो रहा है। तब हमें समझ आता है कि यह तो पूरा झूठ की बुनियाद पर टिका था। प्रोपेगेंडा की खोखली नींव पर टिका था।
विपक्ष की राजनीति और तथ्यों का अभाव
मोदी के सामने मुकाबले में राहुल, तिलचट्टे और लाल झंडे वाली लेफ्टिस्ट पार्टियां हैं। राहुल, तिलचट्टे और वामपंथी तीनों में एक बात कॉमन है। प्रोपेगेंडा। माहौल बनाना। जमीन पर कुछ नहीं है। इसलिए वे इवेंट के दम पर ही टिकने की असफल कोशिश कर रहे हैं। लेकिन समस्या इवेंट या मार्केटिंग की नहीं है। उसमें तो बीजेपी भी माहिर है। लेकिन कुछ दम तो हो…सत्य हो…फेक्ट्स तो हो…फेक्ट्स को कड़ियों में पिरोकर उन्हे सत्य तक पहुंचाने का तर्क तो हो। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। बेतरतीब से बिखरे हुए…यहां-वहां से उठाए हुए फैक्ट्स हैं…जिन्हें किसी अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता।
भारत की आत्मा और दिल्ली का दायरा
राहुल, तिलचट्टे और लालझंडा वाले वामपंथी। आखिर फेल कहां हो रहे हैं। दरअसल वे भारत की आत्मा को पकड़ ही नहीं पा रहे हैं। या इसमें उनका विश्वास ही नहीं है। उनके सारे झूठ की पोल एक-एक करके दिल्ली के 2 बॉय 2 वर्ग किलोमीटर के एरिया में खुलकर रोज सामने आ रही है।
सार्वजनिक आचरण और नेतृत्व का चरित्र
राहुल ने भाजपा के बुजुर्ग सांसद प्रताप सारंगी को संसद की सीढ़ियों पर धक्का मारकर इसकी शुरूआत की थी। राहुल जापानी ब्लेक बैल्ट के अपने अलग ही नशे में घूम रहा है। एक फ्लाईओवर के नीचे वोटर लिस्ट में नाम को लेकर एक एसडीएम को धमकाना कि मेरा समय आने दो मैं देख लूंगा। और उसका आकाशवाणी में घुसने वाले दिन पुलिस वालों को धक्का देना, गरियाना। सिक्योरिटी वाले के गले में तकरीबन कोहनी के जोर से उसे धकेलते हुए आगे बढ़ जाना। एक प्रदर्शनकारी के पेट पर बैठ जाना और प्रदर्शन के दौरान सबसे फूहड़ कृत्य करते हुए एक महिला पुलिस कर्मी को पीछे से पकड़ना। उसकी पीठ और बगल में हाथ डालना, उसे धकियाना। नेतृत्व का चरित्र को कहीं नहीं दिखता है।
व्यवहार में समानता और रील्स की राजनीति
उसकी बहिन प्रियंका भी पीछे नहीं। वह भी महिला पुलिस कर्मी की छाती में जोर से कोहनी मारने से बाज नहीं आई। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद अपनी ओर से मुलाकात पर एक तरफा टिप्पणी कर देना। यह सब क्या है। राहुल और प्रियंका की इन सब हरकतों में एक बात कॉमन है। झूठ और आत्मबल की कमी होना। या बिल्कुल ही नहीं होना। यह सब जेन जी की मोबाइल रील के लिए तो ठीक है। लेकिन देश की आत्मा को अपील नहीं करता है।
‘तिलचट्टों’ के दावे और जमीनी सच्चाई
इसी तर्ज पर तिलचट्टे चल रहे हैं। क्योंकि वे निकले तो अपने गुरु केजरीवाल की नर्सरी से ही तो हैं ना…तो उनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है। तिलचट्टे ने महाराष्ट्र में एयरपोर्ट से उतरने ही बोला कि दिल्ली पुलिस ने उसकी दादी की मृत्यु की जानकारी उसे नहीं दी। यही बात उसके साथी तिलचट्टे ने दिल्ली में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में दोहराई। लेकिन सच्चाई क्या है वह आप खुद ही इस वीडियो में देख लीजिए।
जंतर-मंतर की घटनाएं और झूठी सहानुभूति
तो आपने देखा कि ये तिलचट्टे मोबाइल रील्स से पूरी दुनिया में यह बताने में जुटे हुए हैं कि वे कितने सच्चे हैं। असहाय है। सरकार उनपर कितना जुल्म कर रही है। दिल्ली पुलिस उनके साथ कितना अन्याय कर रही है। 1 दिन की परमिशन लेकर 37 दिनों तक जंतर मंतर पर बैठे तिलचट्टों ने 125 से ज्यादा दिल्ली पुलिस के जवानों को जख्मी कर दिया था। यहां तक की इनके समर्थकों ने दिल्ली पुलिस के एसीपी भगत की लिंचिंग भी की। और अब उसी एसीपी पर एक तिलचट्टी ने छाती दबाने का आरोप लगा दिया है। हद हो चुकी है। लेकिन करें क्या जब गुरू ही बच्चों की कसम खा-खा कर दिल्ली की गद्दी पर जा बैठा तो उसके चेलों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
वामपंथियों का कैमरामैन ड्रामा
अब आ जाते हैं लाल झंडे वाले वामपंथियों पर। इनमें से एक लाल झंडन को भी यही मोबाइल रील्स की बीमारी है। जैसे ही मोबाइल कैमरे देखती है या तो जमीन पर लेट जाएगी। या बस की खिड़की से निकल माहौल बनाएगी कि उससे बड़ी झंडाबरदार कोई नहीं है। या फिर साथी कैमरा मैन को इशारा कर कनॉट प्लेस में मुश्किल से 20 मीटर दौड़ेगी। यह इतना ही जितना आपके घर के पास की कोई किराणा की दुकान हो।….कैमरा वाला पीछे-पीछे दौड़ता जाएगा। कट गई रील। तो अपने आप को कर देगी दिल्ली पुलिस के हवाले। यह ठीक वैसा ही है जब खेत से छोड़ा गया बछड़ा दौड़ लगाता हुए बाड़ें में अपने आप घुस जाता है।
रील्स और नई पीढ़ी का भ्रम
समस्या यह नहीं है कि ये सब झूठ कर रहे हैं। माहौल बना रहे हैं। प्रोपेगेंडा कर रहे हैं। समस्या यह है कि मोबाइल के साथ पैदा हुई जैन जी, जैन एल्फा इनके इस प्रोपेगेंडा को सच मानने का यकीन कर रही है। हालांकि 20 जुलाई के जंतर-मंतर 1.0 के बाद अब यह यकीन कम हो चला है लेकिन फिर भी रील तो रील ही है। सामने आती ही रहती हैं। और फिर कहा गया है ना कि अगर आप एक झूठ को 100 बार बोलते हो तो वह सच लगने लगता है।
वामपंथी विचारधारा और सत्ता का खेल
समस्या क्या है पता है। यह मैंने आपको इस वीडियो में पहले भी बताया था कि राहुल हो या तिलचट्टे सब लाल झंडे के रंग में रंग गये हैं कि सत्ता को ताकत से उखाड़ा या झुकाया जा सकता है। लाल झंडा बीते 75 साल से देश में यह करने का प्रयास कर रहा है। लेकिन कामयाब नहीं हो पाया है। बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में उनके समर्थक नक्सलियों को तो सफाया ही हो चुका है। और उनके गढ़ बंगाल और त्रिपुरा पहले ही ढह चुके हैं। लेकिन बची कुची ताकत से वे क्रांति के नाम पर बरगलाये गए छोटे-छोटे बच्चों को आगे कर दिल्ली के 2 बाय 2 किलोमीटर के एरिया में पुलिस के साथ आइस-पाइस खेल रहे हैं। कि वे रील्स बनाकर सरकार को झुका देंगे।
भारत का स्वभाव और जनमानस की जीत
भारत का क्षेत्रफल करीब 33 लाख वर्ग किलोमीटर है। राहुल, तिलचट्टे और लाल झंडा 4 किलोमीटर वर्ग में रील-रील खेलकर मोदी सरकार को उखाड़ फैंकना चाहते हैं तो उनकी इस सोच पर बलिहारी जाएं। क्योंकि वे जानते ही नहीं हैं भारत की जनता को ताकत से नहीं हराया जा सकता उसका दिल त्याग और अहिंसा से ही जीता जा सकता है।
