घनेन्द्र सिंह सरोहा
नई दिल्ली, 5 अक्टूबर। तिलचट्टे, अर्बन नक्सल, माओवादी कांग्रेस मुस्लिम लीग और केजरीवाल पार्टी सबको पता है कि मोदी की सबसे कमजोर नब्ज कहां है। जंतर-मंतर…जहां आपको सुप्रीम कोर्ट। सोशल मीडिया और घटिया एवं अन प्रोफेशनल दिल्ली पुलिस का कोम्बो मिलेगा। इसीलिए 24 सितंबर को 48 घंटे का अल्टिमेटम देने वाले तिलचट्टे 2 अक्टूबर को मुंबई पहुंच गए। वहां कुछ बात नहीं बनी तो अब 10 अक्टूबर को दिल्ली कूच का एलान कर दिया है। इस बीच जंतर-मंतर जाने वाले रास्तों पर अर्बन नक्सल और दिल्ली पुलिस के बीच रोजाना कुछ घटों का गरबा रास तो चल ही रहा है। माहौल बनाए रखने के लिए।
आंदोलनजीवियों को जंतर-मंतर ही क्यों सुहाता है?
अब सवाल यह उठता है कि चाहे अन्ना हजारे हो, केजरीवाल हो या अब तिलचट्टे। इन सब आंदोलन जीवी लोगों को जंतर-मंतर और इंडिया गेट ही क्यों सुहाता है। वे दिल्ली में ओर कहीं जाकर धरना-प्रदर्शन क्यों नहीं करते। खासतौर पर रामलीला मैदान या बुराड़ी का खाली मैदान। इसके बहुतेरे कारण हैं। लेकिन एक सीधा सा कारण है जंतर-मंतर की जगह का छोटा होना। यह इतनी छोटी जगह है कि आपके या हिन्दुस्तान के किसी भी शहर की एक छोटी सी सड़क। जिसकी लंबाई मुश्किल से 20 से 30 मीटर होगी और चौड़ाई भी तकरीबन इतनी ही।
300 लोगों की भीड़ और क्लोज-अप कैमरों का मायाजाल
अब इतनी सी छोटी जगह में आप 300 से 400 लोग इकट्टा कर लेंगे तो ऐसे लगेगा कि जैसे लोगों को हुजूम उमड़ आया हो। सोशल मीडिया वाले जानबूझकर कैमरे को क्लोज शूट करते हैं ताकि स्क्रीन पर ज्यादा एक्शन दिखे। रही-सही कसर दिल्ली की अनप्रोफेशनल पुलिस कर देती है। जिन बैरिकेड्स के पास वह खड़ी होती है…सारा तमाशा वहीं होता है। अब आप देख लो। दिल्ली एनसीआर की आबादी 2 करोड़ के करीब होगी। लेकिन बैरिकेट के एक ओर खड़े दिल्ली पुलिस के कुछ सिपाही और दूसरी ओर खड़े कुछ आंदोलन जीवी। और इनकी नूरा कुश्ती पर फोकस करते हुए यूट्यूबर्स के मोबाइल कैमरे।
दिल्ली पुलिस का अनप्रोफेशनल रवैया और बसों का तमाशा
देश के कौने-कौने में बैठे लोगों खासतौर पर जेनजी को लगता है पता ही नहीं क्या हो रहा है दिल्ली में। अगर मोदी सरकार 10 अक्टूबर को लेकर दिल्ली पुलिस के भरोसे बैठी है तो उसका भगवान ही मालिक है। दिल्ली पुलिस का यह हाल है कि वह प्रदर्शनकारियों को बस में एक दरवाजे से ठूंस रही है तो प्रदर्शन कारी या तो खिड़की से या फिर इमरजेंसी गेट खोलकर फिर से प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं। कुछ प्रदर्शनकारी बसों के टायरों की ही हवा निकाल रहे हैं तो कुछेक बसों के ड्राईवर के हाथों से चाबी छिनकर ही भागे जा रहे हैं। ताकि ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी। सही चल रहा है दिल्ली पुलिस का।
रणनीतिहीन पुलिस और महिला फोर्स का लचर रवैया
दिल्ली पुलिस के पास गिनती के इन कुछ गिने-चुने युवाओं को रोकने की या पकड़ने की कोई रणनीति नहीं है। यह कभी बस के आगे लेट जाते हैं तो कभी दिल्ली पुलिस के साथ ही गुत्थमगुत्था करने में लग जाते हैं। और दिल्ली पुलिस के पास कोई जवाब नहीं होता है। लड़कियों को संभालने के लिए तो दिल्ली की महिला फोर्स के तो क्या ही कहने। बस के टूटे हुए शीशों से कूदने का प्रयास करती डिटेने की हुई लड़की से दिल्ली की महिला पुलिस कहती है कि यहां से मत कूदो गेट से निकल जाओ। मैडम इनको जाने ही देना था तो पकड़ा ही क्यों। यह तो हाल है दिल्ली पुलिस का।
रामलीला मैदान से परहेज और ‘फास्ट-फूड वाली पिकनिक क्रांति’
तो यह सब ड्रामा, एक्शन, बस, बैरिकेड आपको रामलीला मैदान या बुराड़ी के खुले मैदानों में कहां मिलेगा। फुटेज मिलना तो दूर। क्योंकि खाली पड़े मैदान प्रदर्शनकारियों की संख्या की सारी हकीकत खोलकर रख देंगें। वहां ना तो पेड़ों की छाया, ना जंतर-मंतर की तरह किनारे पर ही चाय, समोसे, इडली, डोसा, कोल्ड ड्रिंक की दुकानें। वहां तो कड़ी धूप और दूर तक पसरा सन्नाटा है। ऐसे में किसी भी आंदोलनजीवी को रामलीला मैदान नहीं सुहाता है। इनको बस एक संकरा सा रास्ता जिसके दोनों ओर अच्छ से भरे-भरे नीम के छायादार पेड़ मिलते हैं एनर्जी भरने और सुस्ताने के लिए। पास में ही सड़कों पर रैंगता ट्रेफिक। हल्ला करने व घेरने के लिए पुलिस थाना बगल में ही है। संसद भी दो कदम की दुरी पर। मीडिया हाउस भी नजदीक ही। फिर क्या चाहिए ऐसी आरामदायाक पिकनिक फास्ट-फू़ड वाली कोजी-कोजी कथित क्रांति करने के लिए। और फिर आप दिल्ली पुलिस पर छेड़छाड़ के आरोप भी लगा सकते हो। SC/ST का ब्रह्मास्त्र तो कहीं गया ही नहीं।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और उपद्रवियों को मिलता संरक्षण
अब मैं यहां मोदी सरकार को बता देना चाहता हूं। हालांकि पहले की वीडियो में भी बता चुका हूं। एक बार फिर बता रहा हूं कि उन्हें क्या करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट कहां और किनके साथ खड़ा है। यह आप कुछ फैक्ट्स जानकर जान ही जाएंगे। जंतर-मंतर की जगह कहीं ओर प्रदर्शन करने की जगह होनी चाहिए। इसकी सुनवाई कोर्ट में हो रही है। इंडिया गेट कोई प्रदर्शन या आंदोलन करने की जगह नहीं है। तिलचट्टों ने कहा कि वे 5 सितंबर को इंडिया गेट पर इक्ट्ठा होकर दिल्ली पुलिस कमिश्नर ऑफिस तक मार्च निकालेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से कहा कि हम उनको मार्च करने से नहीं रोकेंगे। कानून – व्यवस्था बनाए रखना दिल्ली पुलिस का काम है। और इस पर तुर्रा यह कि दिल्ली पुलिस के ऊपर जान लेवा हमला हो, उन्हें मारा-पीटा जाए, महिला पुलिसकर्मियों के साथ छेड़छाड़ की जाए। तो सुप्रीम कोर्ट कहेगा कि ऐसे मामलों में कथित आंदोलनकारी युवाओं के खिलाफ दर्ज मुकदमों को उठा लिया जाए।
रील्स की दुनिया में अनजाने में टूलकिट बनते युवा
मैं ना कभी आंदोनल के खिलाफ रहा हूं। और ना ही कभी आंदोलनकारियो के खिलाफ। लेकिन ये जंतर-मंतर पर रील्स के साथ पिकनिक मनाते बच्चे और इन्हें अपने मोबाइल पर देखते देश के कोने-कोने में बैठे युवा अर्बन नक्सल और माओवादी कांग्रेस मुस्लिम लीग के टूल कीट बनते जा रहे हैं यह उनको भी नहीं पता है। क्योंकि कैप्टन स्मिथ मछार की बहादुरी को ये लोग बहादुरी नहीं मानते हैं। क्योंकि कुछ भी बोला तो उनका मुस्लिम वोट नाराज हो जाएगा।
मोदी सरकार के लिए समाधान: सोशल मीडिया की रीच पर नकेल
तो सबसे पहले यह जरूरी काम करे सरकार। सरकार दिल्ली पुलिस को तो हाथों-हाथ प्रोफेशनल नहीं बना सकती। आपको सिर्फ एक काम करना है। सोशल मीडिया पर नकेल डाल दो। यूट्यूब, इंस्टा और फेसबुक चलाने वाली कंपनियां गूगल और इंस्टा पहले से आपके निशाने पर है। बस आप इनपर कंट्रोल कर लीजिए। बाकि सब चीजें ठीक हो जाएंगी। क्योंकि यह रील वाली जेनेरेशन की कथित क्रांति है। रील की रीच नहीं जा रही। ये खत्म हो जाएंगे। पहले यह कर लो फिर बाद हम दूसरा काम देखेंगे।
