- घनेन्द्र सिंह सरोहा
- नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई (UPI) लेन-देन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने की घोषणा के बाद देश भर के व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं में असंतोष की लहर फैल गई है। हालांकि सरकार का दावा है कि इसका सीधा असर आम जनता पर नहीं पड़ेगा, लेकिन व्यापारिक संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी जेब से यह शुल्क नहीं भरेंगे। नतीजतन, इस फैसले का आर्थिक बोझ ग्राहकों पर पड़ने या फिर लोगों के दोबारा नकद लेन-देन (Cash
15 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम और ग्राहकों पर मंडराता अतिरिक्त बोझ
सरकार की योजना के तहत 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के डिजिटल भुगतान पर 0.4% MDR वसूला जाएगा। भले ही आधिकारिक तौर पर यह कहा जा रहा है कि यह शुल्क मर्चेंट्स (दुकानदारों) से लिया जाएगा, लेकिन बाजार की वास्तविक स्थिति अलग है। जिस तरह वर्तमान में कई दुकानदार क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान पर 1% से 3% तक अतिरिक्त चार्ज वसूलते हैं, वही स्थिति अब यूपीआई में भी देखने को मिल सकती है। आगामी त्योहारों—दशहरा और दिवाली—के दौरान जब लोग खरीदारी के लिए निकलेंगे, तो दुकानदार 0.4% अतिरिक्त नकद देने या फिर केवल कैश में भुगतान करने की शर्त रख सकते हैं।
पेट्रोल डीलरों का इनकार, विरोध प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट में याचिका
इस फैसले के सामने आते ही ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर एसोसिएशन ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर यह शुल्क वहन करने में असमर्थता जताई है। वहीं फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया पेट्रोलियम ट्रेडर्स ने साफ ऐलान कर दिया है कि वे 2,000 रुपये से अधिक का यूपीआई भुगतान स्वीकार ही नहीं करेंगे। व्यापारियों का तर्क है कि जब वे पहले से ही सीजीएसटी, एसजीएसटी, वैट, एक्साइज और पॉल्यूशन टैक्स दे रहे हैं, तो महीने के लाखों रुपये का नया आर्थिक भार क्यों सहें। इस बीच, सरकार के इस फैसले को मनमाना और जनविरोधी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दाखिल की गई है, जिसमें इस पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई है।
50 करोड़ यूजर्स, साइबर सुरक्षा और ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ का सरकारी गणित
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में देश में लगभग 50 करोड़ लोग यूपीआई सेवा का उपयोग कर रहे हैं। इतने बड़े नेटवर्क की सुरक्षा, हैकिंग और साइबर अटैक से बचाव तथा इंफ्रास्ट्रक्चर के संचालन पर सरकार को हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा, यूपीआई मार्केट के लगभग 80% हिस्से पर गूगल पे (Google Pay) और फोनपे (PhonePe) जैसी दो अमेरिकी कंपनियों का कब्जा है। सरकार का तर्क है कि MDR लागू करने से घरेलू फिनटेक कंपनियों को ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ मिलेगा और नेटवर्क को देश के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचाने के लिए जरूरी फंड जुट सकेगा।
मुफ्त राशन और 4 लाख करोड़ का बैंक मुनाफा vs 20 हजार करोड़ का भार
सरकार की इस दलील पर आर्थिक विश्लेषकों और आम जनता ने गंभीर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि जो सरकार देश की 80 करोड़ आबादी को 2.25 लाख करोड़ रुपये का मुफ्त राशन दे सकती है और सालाना 65,000 करोड़ रुपये किसान सम्मान निधि पर खर्च करती है, वह यूपीआई के 20,000 करोड़ रुपये का बोझ उठाने में क्यों कतरा रही है? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि बीते वित्त वर्ष में देश के कमर्शियल बैंकों का मुनाफा 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा है और यूपीआई कंपनियां भी करोड़ों के लाभ में हैं। ऐसे में इस खर्च की भरपाई छोटे व्यापारियों और जनता के मत्थे मढ़ने के औचित्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
हालिया नीतिगत विवाद और जनता को भरोसे में लेने की चुनौती
राजनीतिक और नीतिगत विश्लेषकों के अनुसार, पूर्व में भी कई ऐसे फैसले देखने को मिले हैं जहां शुरुआती घोषणाओं के बाद उत्पन्न जनविरोध के कारण सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। चाहे शिक्षा मंत्रालय का यूजीसी ओबीसी से जुड़ा मामला रहा हो, पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (Ethanol 20) का मुद्दा हो, नीट (NEET) पेपर लीक की घटनाएं हों, या फिर तीन कृषि कानून, CAA, NRC और FCRA जैसे विषय रहे हों। जानकारों का मानना है कि फैसलों को लागू करने से पहले जनता को भरोसे में न लेना सरकार के लिए बार-बार नीतिगत संकट खड़ा करता है, जैसा कि पूर्व में एलपीजी सब्सिडी छोड़ने या राशन कार्ड सुधार की अपीलों के समय सफलतापूर्वक किया गया था।
डिजिटल इंडिया को झटका, कैश इकॉनमी और ब्लैक मनी का बढ़ता खतरा
व्यापारियों के सख्त रुख और यूपीआई से हाथ खींचने के फैसले से देश के ‘डिजिटल इंडिया’ मिशन को बड़ा झटका लग सकता है। यदि 2,000 रुपये से अधिक के भुगतानों पर यूपीआई अस्वीकार किया जाता है, तो जनता को मजबूरी में नकद लेन-देन (Cash Transactions) की ओर लौटना पड़ेगा। अर्थव्यवस्था का दोबारा कैश मोड में जाना न केवल डिजिटल पेमेंट्स और सरकारी रेवेन्यू कलेक्शन को प्रभावित करेगा, बल्कि अनौपचारिक लेन-देन और ब्लैक मनी (काले धन) के दोबारा बढ़ने की संभावना पैदा कर देगा।
