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बहुसंख्यक हिंदू वोटरों को भूले बैठी मोदी सरकार का कैरेक्टर तिलचट्टे,पाकिस्तान और चीन से पता चलता है…

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का दिमाग खराब हो गया है। या तो तिलचट्टों के लिए पलक पांवड़े बिछा रखे थे या फिर इन्हें अब अदने से शांति भंग जैसे मामले में उलझा कर रख दिया है। और ये भी जमा सी हैं….सी का अंदाजा आप लगा ही सकते हैं.…तो मैं बता रहा था कि ये भी जमा सी हैं…कल तक मोदी को गरिया रहे थे आज छोटे से मुकदमें में उलझकर रह गए हैं। 

क्रांति का खोखलापन और नेताओं के पलटने की आदत यही होता है जब रील्स और जोमेटो खाकर क्रांति होती है तो यही होता है। आत्म शक्ति और आत्म बल तो बिल्कुल नहीं है। तिलचट्टे असल क्रांतिकारी होते तो बेल बॉन्ड भरते ही नहीं। देखते सरकार कितने दिनों तक उनको जेल में रखती। जनता उन्हें देर-सबेर छुड़ा ही लेती। लेकिन चक्कर क्या है ना कि जनता नीट को लेकर उद्वेलित …उन्होंने भी…बहती गंगा में हाथ धो लिए …..मुख्य चुनाव आयुक्त मामले में भी उन्हें ऐसा ही लगा कि सरकार उनके पैराें में लौट जाएगी।

एक प्रमुख चेहरे का यू-टर्न और दावों की हकीकत लेकिन जब सरकार ने देखा जनता तिलचट्टों के साथ नहीं है तो सरकार ने तिलचट्टों को लपेट दिया। ऐसा लपेटा कि एक तिलट्टा ….जिसने सबसे ऊंचा झंडा उठा रखा था…और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के बाद जो….सबसे ऊंची आवाज में बोल रहा था….कि झुकती है दुनिया…झुकाना वाला चाहिए…आज कह रहा है कि मेरा इस आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। यह सब रांका और दास का किया धरा है। मैं तो कुछ नहीं हूं। वो जो बोलते हैं मैं वो करता हूं। वे जहां मुझे बैठने के लिए बोलते हैं मैं वहां बैठ जाता हूं और जहां उठने के लिए बोलते हैं वहां से उठ जाता हूं। मेरा कुछ लेना-देना नहीं है। नेता और मास्टर माइंड वे ही है।

तिलचट्टों के बयानों पर संदेह और फ्रॉड की राजनीति तिलचट्टे दीपके के इस बयान का क्या मतलब है। क्या वह पलट गया है। कानूनी भाषा में कहूं तो क्या वह सरकारी गवाह टाइप का बन गया है। लेकिन इन तिलचट्टों की जबान का कोई भरोसा नहीं है। ये कब कहां फिसल जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि कभी ये पुलिस के पैरों में पड़ जाते हैं तो अगले ही पल कहने लगते हैं कि देखो हमने झुका दिया।

गुजराती बंधुओं की रणनीति और बदलता समीकरण खैर तिलचट्टों का रंग तो सबके सामने आ गया है। हालांकि इनको लेकर मुझे मैं कभी कन्फ्यूज नहीं था। मैं पहले भी अपने कई वीडियो में कई बार बता चुका हूं कि यह तिलचट्टे फ्रॉड है… हिस्ट्री की बिना नॉलेज वाले जैन जी और जैन अल्फा का बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। लेकिन मुझे ताजुब इन दोनों गुजराती भाइयों से हो रहा है नरेंद्र मोदी और अमित शाह से। कल तक यह दोनों तिलचट्टों के पैरों में लौटे हुए थे मुकदमे वापस ले रहे थे मंत्री का इस्तीफा भी दे रहे थे और आज इन्हें चप्पलों से ऐसे रगड़ दिया है की सांस लेना भी उनके लिए दुर्बल हो गया है।

मोदी और अमित शाह की दोहरी कार्यशैली ………………….इस पूरे घटनाक्रम से तिलचट्टों का चरित्र नहीं गुजराती बंधु मोदी और अमित शाह का करैक्टर पता चलता है कि जब दुश्मन या प्रतिद्वंदी सामने बहुत मजबूत स्थिति में हो तो ये बिल्कुल झुक जाएंगे…. सरेंडर कर देंगे और संवैधानिक संस्थाओं तक की बलि ले लेंगे….. लेकिन जब देखेंगे कि वही दुश्मन अब बहुत ही कमजोर स्थिति में है तो उसको नेस्तनाबूत करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे कि वह दम भर सांस भी ले ले। फिर भले ही वे 25 से 30 साल के छोटे-छोटे तीन चार लड़के ही क्यों ना हो।

कमजोर स्थिति में सत्ता बचाने की प्रवृत्ति ………….और सरकार का यही कैरेक्टर चिंता पैदा करता है की वह कमजोर स्थिति होने पर अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए सत्ता के सिंबल या संवैधानिक संस्थाओं की बलि देने से भी नहीं चूकती हैं उदाहरण देकर बताता हूं मैं आपको… तभी समझ में आएगा।

लाल किले की घटना और सरकार का नरम रुख ………..आपको याद होगा जब लाल किले पर किसान ट्रैक्टर लेकर चढ़ गए थे आईटीओ के चौराहे पर जमकर उत्पात मचाया था…. यह बात करीब 5 साल पुरानी है…. 26 जनवरी 2021 को जब प्रधानमंत्री आज के कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस परेड के आयोजन में हिस्सा ले रहे थे ….तो ठीक उनके बगल में ….लाल किले की प्राचीर पर फहराये जाने वाले तिरंगे को हटाकर…. किसान धर्म विशेष की पताका फहराकर जश्न मना रहे थे …..पुलिस वालों को लाल किले की प्राचीर से सटाकर…. घेर- घेर कर मार रहे थे। उन्हें विवश कर रहे थे कि वह 40-40 फीट ऊंची दीवारों से नीचे खाई में कूद जाएं। और पुलिस वालों को जान बचाने के लिए ऐसा करना भी पड़ा। यू ट्यब भरा पड़ा है ऐसे वीडियो से। आपको समय मिले तो देख लेना….

धर्मेंद्र प्रधान मामले में मुकदमों की वापसी खैर बदले में सरकार ने क्या किया… किसानों के विरुद्ध दर्ज मुकदमों में से एक तिहाई को वापस ले लिया …ठीक यही काम सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान वाले मामले में भी किया जब तिलचट्टे 20 जुलाई को संसद भवन की ओर कूच कर रहे थे तभी तिलचट्टे व उनके समर्थकों ने डेढ़ सौ से ज्यादा पुलिस कर्मियों पर पथराव व लिंचिंग कर उन्हें घायल कर दिया…तो तिलचट्टों व उनके समर्थकों के खिलाफ दर्ज तेरा मुकदमे सरकार ने वापस ले लिए क्योंकि तब सरकार को लगा कि वह दबाव में है तो वह सुप्रीम कोर्ट को साथ में लेकर यह कर सकती है। और उसने ऐसा किया भी 13 मुकदमें वापिस ले लिए।

सरकार के एकतरफा फैसले और पीछे हटने का इतिहास मोदी सरकार के साथ दिक्कत क्या है….पता है….वह जो भी फैसला ले रही है वह अपने हिसाब से अपनी मर्जी के फैसले ले रही है…. और फिर बाद में पीछे हट जाती है…उदाहरण देकर मैं आपको बताता हूं कि उसने बिना किसी से पूछे समझे सबसे पहले नोटबंदी लागू कर दी थी…. काला धन, आतंकवाद, नकली नोट, इन तीन बड़े मुद्दों को लेकर नोटबंदी की गई 120 करोड़ की देश की तब की आबादी को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन यह तीनों की तीनों समस्या आज भी सरकार के सामने खड़ी हुई हैं…फिर भाई लोग तीन कृषि कानून लेकर आए फिर किसान जब साल भर से ऊपर तक डटे रहे तो इन्हें वापस ले लिया…ऐसे ही 2014 में सत्ता में आते ही भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लेकर आई जिसे भी भारी विरोध के चलते वापस लेना पड़ा….CAA, NRC को लेकर आई…. उसमें भी सरकार को पीछे हटना पड़ा…. अग्निपथ योजना में भी सरकार की किर किरी हुई… इसी साल जनवरी में यूजीसी आरक्षण विवाद सरकार की गले की फांस बन गया है और नीट परीक्षा से पहले सरकार एक तरफा फैसला लेते हुए एथेनॉल 20 से एथेनॉल 85 करने जा रही थी जब जनता का विरोध हुआ तो इथेनॉल 10 पर लौटने का विचार करने लगी।

नीतियों पर पुनर्विचार और बिना सलाह के निर्णय तो यह सब क्या दिखाता है… सरकार का यही चरित्र दिखाता है कि वह बिना सलाह मशवरे के एक तरफा फैसले लेती है उन्हें खुला छोड़ देती है अगर जनता का दबाव आता है तो पीछे हट जाती है… नहीं तो वह एक तरफा आगे बढ़ जाती है।

विदेश नीति और मजबूत राष्ट्रों के आगे चुप्पी सरकार का यह कैरेक्टर पाकिस्तान चीन अमेरिका, रूस व अन्य दूसरे देशों के साथ भी देखा जा सकता है। अब आप कहोगे कि देश की अंदरूनी समस्याओं पर बात करते-करते मैं कहां विदेशी मामलों में जा पहुंचा हूं। मैं यही बताने जा रहा हूं कि सरकार का करेक्टर सब जगह एक सा ही होता है। चाहे देश के भीतर का मामला हो या बाहर का। जब सामने वाला देश मजबूत हो…जैसे अमेरिका, रूस, चीन तो सरकार अपनी सारी कमजोरियों को कथि कूटनीति का नाम दे देती है। जैसे पहले चीन के साथ डोकलाम हुआ फिर गलवान हुआ और अब आईटीबीपी के डीजी कह रहे हैं कि अरुणाचल प्रदेश में जुलाई से चीनी सेना के साथ टकराव चल रहा है…. जिसको मोदी सरकार ने हमेशा दबाए रखा। अरुणाचल से बीच-बीच में ऐसी रील्स भी आती रही कि वे मोदी सरकार से गुहार कर रहे थे कि सरकार कड़े कदम उठाए क्योंकि चीनी सेना जिस तरह से उनके गांव में आकर हस्तक्षेप कर रही है उन्हें साफ लग रहा है कि वे कुछ ही महीनों में चीन का हिस्सा हो जाएंगे।

कूटनीति की आड़ और पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामकता कांग्रेस ने इस बारे में सरकार को स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बारे में कोई बयान न देकर संशय वाली चुप्पी बनाए रखी लेकिन अब आईटीबीपी के डीजी के बयान के बाद उनकी स्थिति यही बता रही है कि मोदी सरकार जब सामने शत्रु मजबूत होता है तो चुप्पी साध कर उसे कूटनीति का नाम दे देती है और जब पाकिस्तान जैसा कमजोर राष्ट्र होता है तो सर्जिकल स्ट्राइक पुलवामा या ऑपरेशन सिंदूर चला कर छोटे-छोटे पटाखे छोड़ देती है।

वैश्विक व आंतरिक मोर्चों पर सुस्पष्ट संदेश की आवश्यकता इस बारे में मोदी सरकार को गंभीरता से सोचना होगा कि देश की आर्थिक व राजनीतिक संप्रभुता को बचाए व बनाए रखने के लिए… उसे अपना संदेश साफ व मजबूत रखना होगा….चाहे दुश्मन देश कमजोर हो या मजबूत या फिर अंदरूनी तिलचट्टे, लाल झंडे वाले वामपंथी या मुस्लिमी कांग्रेस लीग हो। उसका कैरेक्टर मजबूत और दबंग ही होना चाहिए।

बहुसंख्यक हिंदू वोटर की उम्मीदें और विपक्ष की स्थिति …………मोदी सरकार का करेक्टर तो आपको पता ही चल गया है कि वह मजबूत के सामने तो झुक जाती है लेकिन कमजोर को मसलने से बाज नहीं आती है।…अब बात करते हैं उस बहुसंख्यक हिन्दू वोटर की…जो बड़ी उम्मीदों से मोदी सरकार को 2014 में लेकर आया था….अमित शाह कह रहे हैं कि वे अगले 30 साल तक देश पर राज करेंगे और इसके लिए उन्होंने विपक्ष खास तौर पर राहुल गेंदी को जिम्मेदार ठहराया जो हर 6 महीने में विदेश चला जाता है यह बात सही है कि मोदी सरकार के सामने विपक्ष बिखरा हुआ और बहुत ही कमजोर स्थिति में है….लेकिन राहुल गेंडी के चक्कर में बहुसंख्य हिन्दू वोटर पर बहुत ज्यादा भरोसा करके बैठें हैं कि वह अगले 30 साल तक कहीं नहीं हिलेगा…वह उनके साथ बना रहेगा…अगर ऐसा होता तो धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा नहीं लेना पड़ता सरकार को….क्योंकि हिन्दू वोटर की नई नवेली पीढ़ी ही सरकार के खिलाफ खड़ी हो गई थी….इसलिए यह तो समझ में आता है कि राहुल गेंडी, कांग्रेस और विपक्ष ऐसे ही रहेगा….लेकिन जो हिलेगा वह बहुसंख्यक हिन्दू वोटर जेन जी , जेन एल्फा ही होगा…और बात बिगड़ी तो 25 से 60 वर्ष वाले हिन्दू वोटर भी हिल जाएंगे…क्योंकि

प्रमुख मुद्दों पर सरकार की नाकामी का अहसास बहुसंख्यक हिंदू वोटर ने मोदी सरकार को इस काम के लिए वोट नहीं दिया था कि वह अयोध्या मंदिर का बेहतर ढंग से प्रबंध न कर पाए और उसकी नाक के नीचे से राम मंदिर में चोरी हो जाए। करोड़ों की तादात में देश में बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के घुसपैठियों के रूप में आने की बात हर चुनाव में उठाई जाए लेकिन चुनाव के बाद इन मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए… जब-जब चुनाव आए तो pok का मुद्दा उछाला जाए लेकिन चुनाव जाते ही फिर से इसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए… सर्जिकल स्ट्राइक हो, बालाकोट एयर स्ट्राइक हो या ऑपरेशन सिंदूर… या फिर चीन के साथ डोकलान,गलवान और अब अरुणाचल प्रदेश… सब दिखावे के टोने टोटके होते रहे लेकिन कभी भी सरकार पाकिस्तान या चीन को मुंह तोड़ जवाब ना दे। ना सामरिक, ना आर्थिक और ना ही कूटनीतिक मोर्चों पर।

जनसंख्या के आंकड़े और हिंदू समाज की चिंताएं ……………2001 और 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की आबादी में कमी आई है वह 80.4 से घटकर 79.8% रह गई है ठीक इसी दौरान मुसलमानों की आबादी में बढ़ोतरी हुई है और अब जब 2021 की जनगणना के नतीजे सबके सामने आएंगे तो हिंदुओं की आबादी में और घातक कमी आने का अनुमान है. देश का बहुसंख्यक वोटर मोदी सरकार से यही कह रहा है कि आप लोगों के होते हुए जनसंख्या घट रही है अयोध्या मंदिर से पैसे चोरी हो रहे हैं बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों और कोई लगाम नहीं लग रही है और इधर कांग्रेस ने भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए अपने आप को कांग्रेस मुस्लिम लीग में बदल लिया है तो ऐसे में बहुसंख्यक हिंदू वोटर मोदी राज में रहते हुए भी अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है क्योंकि दिल्ली जयपुर और उदयपुर में ट्रिपल इंजन की सरकार होते हुए भी आज भी कन्हैया के हत्यारे को अभी तक कोई फैसला नहीं सुनाया गया है…ऐसे में देश की जनता खास तौर पर बहुत संख्यक हिंदू वोटर का यही कहना है कि मोदी सरकार को तिलचट्टा और अपनी कुर्सी बचाने से फुर्सत मिल गई हो तो इस पर भी ध्यान दो कि बहुसंख्यक हिंदू वोटर 2014, 19 और 24 में मोदी सरकार को सत्ता में क्यों लेकर आया था।

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