Saturday, July 25, 2026
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मोदी और बीजेपी नहीं संभले तो CJP जैसे आंदोलन बार-बार होंगे: चुनाव जीतने में माहिर, लेकिन आंदोलन और नैरेटिव की लड़ाई में क्यों पिछड़ रही है बीजेपी?

12 वर्षों में शाहीन बाग से किसान आंदोलन तक कई बार सरकार को फैसलों से पीछे हटना पड़ा; CJP आंदोलन ने फिर खड़े किए गंभीर सवाल

घनेन्द्र सिंह सरोहा

आग से खेलना चाहिए, लेकिन इतना भी नहीं कि कभी-कभी अपना ही घर जल जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी पिछले 12 वर्षों में कई बार ऐसे आंदोलनों का सामना कर चुके हैं, जिनके सामने सरकार को अंततः अपने फैसलों से पीछे हटना पड़ा। शाहीन बाग, किसान आंदोलन, लाल किला प्रकरण, पहलवान आंदोलन और अब CJP का आंदोलन—इन सभी घटनाओं की प्रकृति भले अलग रही हो, लेकिन इनसे जनता के बीच एक संदेश जरूर गया कि नरेंद्र मोदी सरकार को भी लंबे और संगठित आंदोलन के दबाव में झुकाया जा सकता है।

अब CJP आंदोलन को 34 दिन हो चुके हैं। पिछले तीन दिनों में आंदोलन के हिंसक होने के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या सरकार एक बार फिर आंदोलन को शुरुआती दौर में समझने और उसका राजनीतिक जवाब देने में विफल रही है?


सवाल चुनाव जीतने का नहीं, सामान्य दिनों में चुनौती से निपटने का है

नरेंद्र मोदी और बीजेपी चुनाव जीतने में माहिर हैं। सत्ता में बने रहने की क्षमता भी उन्होंने बार-बार साबित की है। लेकिन असली चुनौती चुनाव के बीच के सामान्य दिनों में सामने आती है।

जब कोई ज्वलंत मुद्दा उठता है…

जब कोई आंदोलन शुरू होता है…

जब सरकार के अपने फैसले पर सवाल खड़े होते हैं…

तब सरकार का राजनीतिक और वैचारिक जवाब कितना प्रभावी होता है—यह बड़ा सवाल है।

इसे क्रिकेट की भाषा में कहें तो मोदी और बीजेपी चुनावी राजनीति के टी-20 और वनडे के विश्व चैंपियन हैं। लेकिन सामान्य दिनों में चलने वाले लंबे राजनीतिक संघर्षों के टेस्ट मैच और दो देशों की सीरीज में कई बार उनका प्रदर्शन कमजोर दिखाई देता है।

किसान आंदोलन के बाद तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े। शाहीन बाग के बाद देशव्यापी स्तर पर समान नागरिक संहिता लागू करने की राजनीतिक चुनौती और कठिन हुई। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक जैसे कई प्रस्तावों को सरकार को राजनीतिक विरोध के चलते आगे बढ़ाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बावजूद उसका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव लंबे परिसीमन और जनगणना प्रक्रिया से जुड़ गया।

इन घटनाओं ने एक सवाल खड़ा किया है—

क्या मोदी सरकार के पास मजबूत फैसले लेने की क्षमता है, लेकिन उन फैसलों के खिलाफ बनने वाले जनमत और आंदोलनों को लंबे समय तक संभालने की रणनीति कमजोर है?

और अब इसी सवाल के सामने CJP आंदोलन खड़ा है।

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CJP आंदोलन और विदेशी समर्थन के दावों ने बढ़ाई चिंता

CJP आंदोलन को लेकर कुछ विदेशी और अलगाववादी संगठनों के समर्थन के दावे सामने आए हैं। खालिस्तान समर्थक गुरपतवंत सिंह पन्नू की ओर से आंदोलन के समर्थन और आर्थिक सहयोग की बात कही गई है। दावा किया गया है कि उसके संगठन की ओर से आंदोलन को करीब 10 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद देने की बात कही गई है।

इसी तरह बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ युवाओं के आंदोलन में सक्रिय रहे जमात-ए-इस्लामी की ओर से भी समर्थन की बात सामने आई है।

अमेरिका, ब्रिटेन और आयरलैंड में CJP के समर्थन में प्रदर्शन होने के दावे भी किए जा रहे हैं।

हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। लेकिन यदि किसी आंदोलन को विदेशी संगठनों, अलगाववादी समूहों या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से समर्थन मिलने की बात सामने आती है, तो सरकार के लिए इसकी गंभीर जांच करना आवश्यक हो जाता है।

सवाल यह है कि—

क्या इन दावों की जांच हो रही है?

और अगर हो रही है तो सरकार जनता को इसकी जानकारी क्यों नहीं दे रही?


क्या विदेशों से भेजे जा रहे फूड ऑर्डर किसी बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं?

सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो भी वायरल हैं, जिनमें जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों तक जोमैटो, स्विगी और डोमिनोज जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से फूड पार्सल पहुंचने की बात कही जा रही है।

कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है कि इनका बल्क ऑर्डर दुबई, सऊदी अरब, जर्मनी और अन्य देशों से किया जा रहा है।

इन दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

लेकिन यदि विदेशों से किसी आंदोलन के लिए आर्थिक या लॉजिस्टिक सहायता दी जा रही है, तो यह जांच का विषय जरूर बनता है।

क्योंकि सवाल सिर्फ खाना पहुंचने का नहीं है।

सवाल यह है कि—

क्या आंदोलन के पीछे कोई संगठित आर्थिक नेटवर्क काम कर रहा है?

क्या विदेशी संगठनों की कोई भूमिका है?

क्या भारत में चल रहे किसी आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन और संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं?

इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही मिल सकता है।

लेकिन सरकार इन सवालों को नजरअंदाज नहीं कर सकती।


विदेशी पूंजीवाद, साम्यवाद और स्थानीय पहचान की राजनीति का गठजोड़?

CJP आंदोलन ने एक और नई राजनीतिक तस्वीर सामने रखी है।

एक तरफ विदेशी समर्थन और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े आरोप हैं।

दूसरी ओर देश के भीतर जातीय और सामाजिक पहचान पर आधारित लामबंदी दिखाई दे रही है।

आलोचकों का आरोप है कि इस पूरे आंदोलन में विदेशी पूंजीवादी ताकतों, वामपंथी नेटवर्क और स्थानीय जातीय राजनीति के अलग-अलग हिस्से एक साथ दिखाई दे रहे हैं।

इन आरोपों को साबित करने के लिए ठोस जांच और प्रमाण आवश्यक हैं।

लेकिन राजनीतिक स्तर पर एक नया गठजोड़ जरूर दिखाई दे रहा है—

मोबाइल आधारित डिजिटल मीडिया, जातीय पहचान और सरकार विरोधी राजनीति का गठजोड़।

यही वह क्षेत्र है जहां बीजेपी और राष्ट्रवादी विचारधारा सबसे ज्यादा पिछड़ती हुई दिखाई देती है।


बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी: सक्रिय युवा नेटवर्क का अभाव

वामपंथी छात्र संगठनों जैसे आइसा और एसएफआई ने दशकों से विश्वविद्यालयों और शहरी युवा राजनीति में अपना नेटवर्क बनाया है।

इन संगठनों की ताकत केवल चुनाव जीतने में नहीं है।

इनकी ताकत है—

  • लगातार वैचारिक गतिविधियां
  • कैंपस स्तर पर संगठन
  • सक्रिय युवा नेतृत्व
  • प्रदर्शन और आंदोलन का अनुभव
  • डिजिटल मीडिया का उपयोग
  • मुद्दों पर तुरंत प्रतिक्रिया

इसके मुकाबले बीजेपी और राष्ट्रवादी विचारधारा के पास देशभर में बड़ा संगठन होने के बावजूद दिल्ली, मेट्रो शहरों और प्रमुख विश्वविद्यालयों में ऐसा सक्रिय युवा नेटवर्क दिखाई नहीं देता, जो किसी आंदोलन के सामने तुरंत वैकल्पिक राजनीतिक और वैचारिक मंच खड़ा कर सके।

दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और आईआईटी जैसे संस्थानों में राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े छात्रों और प्रोफेसरों की उपस्थिति बढ़ी है।

लेकिन सवाल यह है—

क्या यह उपस्थिति एक सक्रिय और प्रभावी युवा आंदोलन में बदल पाई है?

जवाब अभी भी पूरी तरह सकारात्मक नहीं है।

और CJP आंदोलन में यही कमजोरी बीजेपी और राष्ट्रवादी विचारधारा को भारी पड़ती दिखाई दे रही है।


जंतर-मंतर पर CJP का मंच था, लेकिन सामने राष्ट्रवादी मंच क्यों नहीं?

यदि CJP आंदोलन का एक मंच जंतर-मंतर पर मौजूद था, तो उसके सामने राष्ट्रवादी युवाओं का समानांतर मंच क्यों नहीं बनाया गया?

अगर एक पक्ष कह रहा था—

“हम सरकार से असहमत हैं।”

तो दूसरा पक्ष कह सकता था—

“हम आपकी बात से असहमत हैं।”

लोकतंत्र में जनता के सामने दोनों पक्षों की आवाज होनी चाहिए।

एक मंच हो तो दूसरा मंच भी होना चाहिए।

एक विचार हो तो उसके सामने दूसरा विचार भी होना चाहिए।

लेकिन समस्या यह है कि बीजेपी और संघ परिवार के पास विशाल संगठनात्मक ढांचा होने के बावजूद CJP आंदोलन के सामने कोई बड़ा, सक्रिय और दिखाई देने वाला वैचारिक मंच नजर नहीं आया।

सवाल यह है कि संघ और बीजेपी के युवा संगठन, मजदूर संगठन, किसान संगठन, वनवासी संगठन और महिला संगठन इस तरह की परिस्थितियों में सक्रिय भूमिका क्यों नहीं निभा पाए?

भोंपू दोनों तरफ बजेंगे, तभी जनता को दोनों पक्षों की बात सुनाई देगी।


आंदोलन का नेतृत्व कमजोर था, फिर भी राष्ट्रवादी ताकतें आगे क्यों नहीं आईं?

CJP आंदोलन के नेतृत्व को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं।

संसद मार्च के दौरान आंदोलन के नेतृत्व से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरों की भूमिका को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठे। आरोप लगाए गए कि जब युवाओं को नेतृत्व की जरूरत थी, उस समय नेतृत्व सामने नहीं दिखाई दिया।

इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है।

लेकिन राजनीतिक सवाल यह है कि—

अगर बीजेपी और संघ परिवार को लगता था कि आंदोलन का नेतृत्व अपरिपक्व है, तो उन्होंने स्वयं वैकल्पिक नेतृत्व क्यों नहीं खड़ा किया?

20 जुलाई को संसद मार्च के समय ही राष्ट्रवादी युवा नेतृत्व आगे आ सकता था।

अगर आंदोलन का नेतृत्व कमजोर था…

अगर आंदोलन दिशाहीन था…

अगर उसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक रणनीति नहीं थी…

तो यही वह अवसर था जब राष्ट्रवादी ताकतें युवाओं के सामने अपना वैकल्पिक मंच रख सकती थीं।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

नतीजा यह है कि आंदोलन अब भी कई दिशाओं में फैलता हुआ दिखाई दे रहा है, जबकि उसका स्पष्ट और मजबूत नेतृत्व दिखाई नहीं देता।


2012 में अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय मीडिया मिला, CJP को मिला मोबाइल मीडिया

CJP आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता उसका डिजिटल स्वरूप है।

2012 का अन्ना आंदोलन राष्ट्रीय मीडिया के कंधों पर सवार होकर देशव्यापी आंदोलन बना था।

लेकिन आज की स्थिति पूरी तरह अलग है।

आज किसी आंदोलन को राष्ट्रीय टीवी चैनल की आवश्यकता नहीं है।

इंस्टाग्राम है।

फेसबुक है।

यूट्यूब है।

लाइव स्ट्रीम है।

शॉर्ट वीडियो है।

और सबसे महत्वपूर्ण—

एल्गोरिदम है।

आज हर व्यक्ति अपना मीडिया हाउस है।

हर व्यक्ति अपना कैमरा है।

हर व्यक्ति अपना दर्शक बना सकता है।

हर व्यक्ति अपना नैरेटिव बना सकता है।

CJP आंदोलन ने इसी डिजिटल शक्ति का इस्तेमाल किया है।

उसने राष्ट्रवादी नेशनल मीडिया को किनारे कर दिया और अपना अलग डिजिटल इकोसिस्टम बना लिया।

उसके पास अपने मोबाइल हैं।

अपने सोशल मीडिया अकाउंट हैं।

अपने इन्फ्लुएंसर हैं।

अपने फॉलोअर्स हैं।

और अपने एल्गोरिदम हैं।

यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है।


‘अल्लाह’ और ‘जय भीम’ के डिजिटल एल्गोरिदम ने बनाया नया राजनीतिक फ्रंट?

इस आंदोलन से एक नया राजनीतिक और डिजिटल फ्रंट उभरता हुआ दिखाई दे रहा है।

दलित और मुस्लिम युवाओं की अपनी डिजिटल आवाज।

अपनी सोशल मीडिया कम्युनिटी।

अपना नैरेटिव।

और अपनी राजनीतिक पहचान।

आलोचकों का मानना है कि यह आवाज राष्ट्रवादी राजनीति, मोदी सरकार और कथित तौर पर ऊंची जातियों के राजनीतिक प्रभुत्व के खिलाफ एक नया मोर्चा तैयार कर रही है।

यह दावा कितना व्यापक और स्थायी है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

लेकिन इतना जरूर है कि सोशल मीडिया ने अलग-अलग सामाजिक समूहों को अपने स्वतंत्र डिजिटल नेटवर्क बनाने की ताकत दे दी है।

अब किसी समूह को अपनी बात रखने के लिए किसी बड़े मीडिया संस्थान की आवश्यकता नहीं है।

वह अपना चैनल बना सकता है।

अपना पेज बना सकता है।

अपना इन्फ्लुएंसर नेटवर्क बना सकता है।

और अपनी राजनीतिक दुनिया तैयार कर सकता है।

बीजेपी और मोदी सरकार इस बदलाव को देख रही हैं।

लेकिन सवाल यह है कि—

क्या वे इसकी गति को समझ भी रही हैं?


समाधान क्या है? राष्ट्रवादी युवाओं को अपना डिजिटल मीडिया बनाना होगा

इस पूरी स्थिति का समाधान बहुत सरल है।

राष्ट्रवादी और अगड़ी जातियों के युवाओं को भी अपनी डिजिटल आवाज बनानी होगी।

दिल्ली के प्रमुख कॉलेजों में सक्रिय राष्ट्रवादी युवा समूह बनाने होंगे।

ऑफलाइन भी।

ऑनलाइन भी।

यह केवल दिल्ली तक सीमित नहीं होना चाहिए।

देश के मेट्रो शहरों के साथ-साथ बी और सी श्रेणी के शहरों में भी युवा डिजिटल नेटवर्क बनाने होंगे।

युवाओं को सिर्फ राजनीतिक दलों के पारंपरिक संगठनों में शामिल होने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए।

उन्हें अपना कंटेंट बनाने देना होगा।

अपना पॉडकास्ट।

अपना यूट्यूब चैनल।

अपनी बहस।

अपना डिजिटल मीडिया।

अपनी भाषा।

अपनी शैली।

आज का युवा सवाल पूछता है।

वह तर्क चाहता है।

वह डेटा चाहता है।

वह किसी नेता की तस्वीर लगाकर केवल नारे लगाने के लिए तैयार नहीं है।

वह अंधभक्त कहलाना नहीं चाहता।

इसलिए राष्ट्रवादी राजनीति को भी अपने युवा संवाद का तरीका बदलना होगा।

नया चेहरा।

नई भाषा।

नए मुद्दे।

और सबसे महत्वपूर्ण—नया डिजिटल नेतृत्व।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोशल मीडिया पर शॉर्ट वीडियो और रील के माध्यम से सीधे युवाओं तक पहुंचने का प्रयास इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा सकता है।


दलित और मुस्लिम युवाओं को सिर्फ वोट बैंक समझकर साथ नहीं लाया जा सकता

इस पूरे राजनीतिक समीकरण में एक और महत्वपूर्ण सवाल है।

क्या राष्ट्रवादी ताकतों को दलित और मुस्लिम युवाओं को अपने साथ लाने के लिए लगातार प्रयास करना चाहिए?

इसका जवाब केवल चुनावी राजनीति से नहीं दिया जा सकता।

किसी भी समुदाय को केवल वोट बैंक समझकर साथ नहीं लाया जा सकता।

अगर कोई युवा राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ आएगा, तो वह इसलिए आएगा क्योंकि उसे लगेगा कि—

  • संगठन मजबूत है
  • विचार आधुनिक है
  • नेतृत्व विश्वसनीय है
  • उसे सम्मान दिया जा रहा है
  • देश के भविष्य के लिए कोई स्पष्ट दृष्टि है

सिर्फ चुनाव के समय हाथ जोड़ने से कोई स्थायी राजनीतिक संबंध नहीं बनता।

सिर्फ दिखावे के लिए गले मिलने से भी नहीं।

पहले राजनीतिक विचार और संगठन को मजबूत बनाना होगा।

फिर जो लोग उस विचार से सहमत होंगे, वे स्वयं जुड़ेंगे।


क्या CJP आंदोलन 15 अगस्त तक खिंच सकता है?

अब सबसे बड़ा सवाल 15 अगस्त को लेकर है।

क्या यह आंदोलन स्वतंत्रता दिवस तक जारी रह सकता है?

क्या कुछ स्थानीय और विदेशी ताकतें चाहती हैं कि देश के राष्ट्रीय पर्व के समय राजनीतिक तनाव बना रहे?

इस तरह के आरोपों को बिना प्रमाण के तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

लेकिन भारत के इतिहास में राष्ट्रीय पर्वों के आसपास बड़े राजनीतिक तनाव पहले भी देखे गए हैं।

26 जनवरी 2021 को किसानों के आंदोलन के दौरान लाल किले पर हुई घटना आज भी देश की स्मृति में है।

वहीं, 2014 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थकों का आंदोलन भी गणतंत्र दिवस समारोह से ठीक पहले राष्ट्रीय राजधानी में चर्चा का विषय बना था।

20 जनवरी 2014 को रेल भवन के आसपास हुए धरने और प्रदर्शन को लेकर उस समय गणतंत्र दिवस समारोह तथा सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखी राजनीतिक बयानबाजी हुई थी।

इसलिए यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि राष्ट्रीय पर्वों के आसपास राजनीतिक तनाव पैदा नहीं हो सकता।

अगर 15 अगस्त के आसपास आंदोलन जारी रहता है और माहौल तनावपूर्ण होता है, तो नुकसान केवल सरकार या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का नहीं होगा।

इसका प्रभाव देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और राष्ट्रीय स्वाभिमान पर भी पड़ सकता है।


मोदी और बीजेपी के सामने अब सबसे बड़ा सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के पास सत्ता है।

संगठन है।

संसाधन हैं।

करोड़ों समर्थक हैं।

फिर सवाल यह है—

जब कोई आंदोलन पैदा होता है तो उसका नैरेटिव बीजेपी के हाथ से क्यों निकल जाता है?

जब कोई युवा आंदोलन सड़क पर आता है तो राष्ट्रवादी युवा उसके सामने अपना मंच क्यों नहीं बना पाते?

जब कोई डिजिटल अभियान शुरू होता है तो जवाब कई सप्ताह बाद क्यों आता है?

क्योंकि तब तक दूसरा पक्ष अपना नैरेटिव जनता के दिमाग में स्थापित कर चुका होता है।

चुनाव जीते जा सकते हैं।

लेकिन अगर नैरेटिव की लड़ाई लगातार हारी जाती रही तो हर कुछ वर्षों में एक नया आंदोलन सामने आ सकता है।

एक आंदोलन खत्म होगा।

दूसरा शुरू होगा।

एक मुद्दा जाएगा।

दूसरा आएगा।

एक चेहरा हटेगा।

दूसरा सामने आएगा।

और सरकार हर बार कहेगी—

“हम देख रहे हैं।”

लेकिन जनता देखेगी—

सरकार फिर फंस गई।


अब सवाल सिर्फ CJP का नहीं, भविष्य की राजनीति का है

क्या बीजेपी और संघ परिवार को आंदोलन का मुकाबला केवल पुलिस और प्रशासन के माध्यम से करना चाहिए?

या फिर उन्हें देश के विश्वविद्यालयों, बड़े शहरों, छोटे शहरों और डिजिटल मीडिया में एक नया, आधुनिक, तर्कशील और सक्रिय राष्ट्रवादी युवा नेटवर्क खड़ा करना चाहिए?

क्या केवल चुनाव जीतना पर्याप्त है?

या अब 365 दिन वैचारिक लड़ाई भी लड़नी होगी?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या CJP जैसे आंदोलनों को केवल सरकार की कमजोरी समझना चाहिए या लोकतंत्र में असहमति की सामान्य प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए?

जवाब आसान नहीं है।

विरोध का अधिकार लोकतंत्र का हिस्सा है।

लेकिन हिंसा का अधिकार किसी को नहीं है।

सरकार की आलोचना का अधिकार है।

लेकिन विदेशी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े आरोपों की जांच भी होनी चाहिए।

संगठन बनाने का अधिकार है।

लेकिन कानून तोड़ने की अनुमति नहीं हो सकती।

यही लोकतंत्र का संतुलन है।

अब सवाल यह है कि इस संतुलन को बनाए रखने के साथ-साथ बीजेपी और राष्ट्रवादी विचारधारा अपनी राजनीतिक और डिजिटल रणनीति को कितना बदल पाती है।

क्योंकि आने वाले समय में लड़ाई केवल चुनावी मैदान में नहीं होगी।

लड़ाई होगी—

मोबाइल स्क्रीन पर।

विश्वविद्यालयों में।

डिजिटल नैरेटिव में।

और युवाओं के दिमाग में।

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